परिंदे उड़ गए अपने परों में जान आते ही, दुआएँ भेजकर उनको, हम दिल को राम करते हैं

राजीव कुमार कनौजिया चीफ फार्मासिस्ट
(बलरामपुर अस्पताल)
सफ़र की धूप के बाद अब ज़रा विश्राम करते हैं,
चलो सुकूँ से बैठें, ढलती एक शाम करते हैं।
जो ज़िम्मेदारियाँ थीं, वो बख़ूबी हम निभा आए,
चलो अब कुछ घड़ी बस ख़ुद को अपने नाम करते हैं।
परिंदे उड़ गए अपने परों में जान आते ही,
दुआएँ भेजकर उनको, हम दिल को राम करते हैं।
बहुत दौड़े ज़माने में, बहुत यादें कमाई हैं,
पुराने दोस्तों को याद अब सुबह-ओ-शाम करते हैं।
मिला जो कुछ भी इस जीवन में, वो नेमत है ऊपरवाले की,
झुकाकर सर उसी के सामने, शुकराना सुबह-शाम करते हैं।
गिला कोई नहीं ‘राजीव’ को इस दौर-ए-ज़िंदगी से,
मोहब्बत बांटते हैं और बस आराम करते हैं।
मैत्री का पैगाम
दुनिया की इस भीड़ में, जो साया बन कर साथ चले,
अंधेरों में भी राह दिखाए, वो दीया बन कर साथ चले।
कभी धूप कड़ी हो जीवन की, तो ठंडी छाँव सा लगता है,
जो हर मुश्किल में हाथ थाम कर, दरिया बन कर साथ चले।
लबों पे हंसी न भी हो अगर, वो आँखों की नमी पढ़ लेता है,
जो खामोशी को शब्द दे दे, वो ज़रिया बन कर साथ चले।
ये दौलत-ओ-शौहरत तो महज़, रश्म-ए-दुनिया है यहाँ,
जो रूह से रूह का नाता जोड़े, वो अपना बन कर साथ चले।
मिलते हैं लोग हज़ारों यहाँ, सफ़र-ए-जिन्दगी में मगर,
जो ‘राजीव’ की पंक्तियों सा खरा हो, वो सखा बन कर साथ चले