चुनाव में महिलाओं को ज्यादा टिकट देने में आरक्षण कोई बाध्यता नहीं
कमल जयंत
लखनऊ। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठï नेता एवं यूपी के पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी राजनीति में महिला आरक्षण के नाम पर महिलाओं को भ्रमित कर रही है। उन्होंने कहा कि अगर भाजपा नेतृत्व की मंशा महिलाओं को राजनीति में ज्यादा भागीदारी देने की है, तो इसे करने में संविधान में संशोधन करने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि महिलाओं को चुनावों में ज्यादा टिकट देने और उन्हें ज्यादा भागीदारी देने के लिए किसी भी दल के सामने किसी भी तरह की कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है।

पांच राज्यों में विस चुनाव हो रहे वहां भाजपा ने क्यों नहीं दिया महिलाओं को पचास फीसदी टिकट
उन्होंने कहा कि अगर महिलाओं को सियासत में ज्यादा भागीदारी देने की भाजपा नेतृत्व की दृढ़ इच्छा है तो कोई भी दल उसमें बाधक नहीं है। उनका कहना है कि भाजपा राजनीति में महिलाओं को आरक्षण देने के नाम पर सिर्फ राजनीति कर रही है। भाजपा अपनी पार्टी से महिलाओं को पचास फीसदी या नब्बे फीसदी टिकट दे दे। विपक्ष इसका तो विरोध नहीं कर रहा है। भाजपा नेतृत्व महिलाओं के लिए अपने दल से लोकसभा व विधानसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा टिकट देकर एक आदर्श स्थापित करे, जिससे विपक्षी दलों को भी अपनी पार्टी से महिलाओं को अधिक से अधिक टिकट देने के लिए मजबूर होना पड़े, लेकिन भाजपा को महिलाओं को राजनीति में हिस्सेदारी नहीं देनी है बल्कि महिलाओं का वोट पाने के लिए महिला आरक्षण के नाम पर राजनीति करनी है। अब देश की महिलाएं भी इस बात को समझने लगी हैं।

भाजपा महिला आरक्षण की समर्थक तो वह अभी से यूपी विस चुनाव के लिए 33 फीसदी आरक्षण के मुताबिक महिलाओं को 134 सीटें देने की घोषणा करे
नसीमुद्दीन ने कहा कि वास्तविकता यह है कि केन्द्र की भाजपा सरकार ने 2023 में संसद में महिला आरक्षण विधेयक पारित करा लिया था, उस समय विपक्ष इसे 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में लागू करने की बात कर रहा था, तब भाजपा ने यह कहकर मना कर दिया था कि पहले जनगणना और परिसीमन होगा उसके बाद महिला आरक्षण लागू होगा। अब यही भाजपा कह रही कि जनगणना और परिसीमन की जरूरत नहीं, इसे तत्काल लागू किया जाए। जबकि वास्तविकता यह है कि बिना जातीय जनगणना के यह कैसे पता चलेगा कि पिछड़ा वर्ग की महिलाओं की कितनी आबादी है। भाजपा दलित, पिछड़ा वर्ग की महिलाओं का राजनीतिक हक छीनने के लिए ही जल्दबाजी में इस संशोधन विधेयक को लागू करना चाहती थी। भाजपा नेतृत्व को इस बात का अंदाजा है कि अगर जातीय जनगणना हो गयी तो दलित व पिछड़ा वर्ग की महिलाओं को उनकी बढ़ी हुई आबादी के मुताबिक सीटें आरक्षित करनी पड़ेंगी।