मायावती के क्रियाकलापों से बसपा व बहुजन आंदोलन दोनों ही समाप्त प्राय : कुंवर फ़तेह बहादुर

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कांशीराम जी द्वारा स्थापित बहुजन समाज व बसपा के उद्देश्यों और लक्ष्यों को दरकिनार कर मायावती जी लंबे समय से अपने व्यक्तिगत तथा पारिवारिक लाभ के लिए काम कर रहीं हैं

कमल जयंत

लखनऊ।  सामाजिक संस्था बहुजन भारत के अध्यक्ष एवं पूर्व आईएएस कुंवर फ़तेह बहादुर का कहना है कि बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती जी के क्रियाकलापों से बहुजन आंदोलन और बहुजन समाज पार्टी दोनों ही लगभग समाप्त हो रहे हैं। बहुजन नायक कांशीराम जी द्वारा स्थापित बहुजन समाज व बसपा के उद्देश्यों और लक्ष्यों को दरकिनार कर मायावती जी लंबे समय से अपने व्यक्तिगत तथा पारिवारिक लाभ के लिए काम कर रहीं हैं। कांशीराम जी ने बहुजन समाज को बामसेफ, डीएस-फोर और बीवीएफ के माध्यम से विभिन्न जातियों में बंटे दलित व पिछड़ा वर्ग के लोगों को एकजुट करने के लिए काम किया। इन वर्गों को एकजुट करने में बामसेफ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।

उन्होंने कहा कि बामसेफ के कार्यकर्ताओं ने बहुजन आंदोलन में अपना खून-पसीना बहाने के साथ ही संगठन को आर्थिक सहयोग देते रहे और संगठन को आगे बढ़ानेे के लिए लगातार काम करते रहे। कांशीराम जी ने दलित एवं पिछड़ा वर्ग की विभिन्न जातियों में नेतृत्व की क्षमता रखने वाले व्यक्तियों को राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में चिन्हित किया और उन्हें आगे बढ़ाया।

कुंवर फ़तेह बहादुर ने बताया कि कांशीराम जी ने इसी क्रम में मायावती जी को भी जाटव समाज की होने के नाते उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ के तौर पर प्रशिक्षित किया। कांशीराम जी का यह सदैव प्रयास रहा कि बहुजन समाज जिनकी आबादी 85 फीसदी है, उन्हें एकजुट किया जाए।

उनका मानना था कि इनकी एकजुटता से ही सत्ता पर काबिज हुआ जा सकता है। और सत्ता में आने के बाद ही बहुजनों को संवैधानिक अधिकार प्राप्त हो पाएंगे और उनके मान-सम्मान की रक्षा हो सकेगी। इसी मुख्य लक्ष्य एवं उद्देश्य को लेकर कांशीराम जी ने बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी की जयंती के मौके पर 14 अप्रैल 1984 को बसपा का गठन किया।

मायावती ने समाप्त किया कांशीराम जी का सामाजिक आंदोलन 

कांशीराम जी द्वारा तैयार किये गये संगठनों के माध्यम से बहुजनों को संगठित किया गया। उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि बहुत कम समय में देश में बसपा राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल के रूप में स्थापित हो गया। जबतक कांशीराम जी स्वस्थ एवं सक्रिय रहे उन्होंने बहुजनों को संगठित करने के लिए विभिन्न जातियों में बंटे समाज को सक्रिय करके बसपा के पक्ष में जनाधार तैयार किया। इसी क्रम में उन्हेोंने 1995, 1997 और 2002 में यूपी में भाजपा के सहयोग से बसपा की सरकार बनायी।

संस्था के अध्यक्ष एवं पूर्व आईएएस कुंवर फतेह बहादुर का कहना है कि 2003 के बाद जब कांशीराम जी अस्वस्थ रहने लगे तो उन्होंने पार्टी की बागडोर मायावती जी को इस विश्वास के साथ सौंपी कि वे बहुजन मिशन को मजबूती प्रदान करेंगी। 9 अक्टूबर 2006 को लंबी बीमारी के बाद कांशीराम जी का निधन हो गया। उनके देहांत के बाद 2007 में यूपी में हुए विधानसभा चुनाव में बहुजनों ने कांशीराम जी के प्रति श्रद्धा एवं सम्मान की भावना से बसपा के प्रति एकजुटता दिखाते हुए एकतरफा बसपा के पक्ष में वोट किया।

उन्होंने कहा कि इसी वजह से यूपी में पहली बार मायावती जी के नेतृत्व में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, लेकिन मायावती जी को लगा कि उनकी सरकार ब्राह्मणों की वजह से बनी है और उन्होंने कांशीराम जी द्वारा प्रतिपादित बहुजन आंदोलन को सर्वजन का आंदोलन बना दिया। जिसकी वजह से बहुजनों को आगे बढ़ाने और उन्हें एकसूत्र में बांधने का जो अभियान कांशीराम जी ने चलाया था। इस आंदोलन से मायावती जी ने किनारा कर लिया और धीरे-धीरे बसपा का सामाजिक संगठन बामसेफ के हाथों से निकलता चला गया और इनके क्रियाकलाप सीमित होते चले गये। मायावती जी का उद्देश्य सिर्फ राजनीतिक रह गया। कांशीराम जी के सामाजिक आंदोलन को धीरे-धीरे करके उन्होंने समाप्त कर दिया। इसके बाद मायावती जी ने कांशीराम जी द्वारा प्रशिक्षित बामसेफ के नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया।

2019 में बसपा ने सपा से एक महीने बाद ही गठबंधन तोड़ लिया

मौजूदा हालात में बसपा में एक भी पुराना नेता नहीं बचा है। या तो उसने बसपा से किनारा कर लिया या मायावती जी ने उसे पार्टी से बाहर कर दिया। समर्पित नेताओं और कार्यकर्ताओं के अभाव में बसपा कमजोर होती चली गयी, इसी का नतीजा रहा कि 2012 में यूपी में हुए विधानसभा चुनाव में सपा की सरकार बनी और बसपा दूसरे नंबर पर रही। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में बसपा अपना खाता नहीं खोल पायी।

यूपी समेत पूरे देश में पार्टी का जनाधार कमजोर हुआ। इसके बाद 2017 में यूपी में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा तीसरे नंबर पर आ गयी और इनकी सीटें घटकर 19 रह गईं। 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में बसपा ने सपा के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा। सपा प्रमुख अखिलेश यादव जी ने यूपी में मायावती जी को नेतृत्व सौंप दिया।

इसका नतीजा यह रहा कि बसपा शून्य से दस पर पहुंच गयी, जबकि अखिलेश यादव अपनी पांच सीटें ही बचाने में सफल रहे। बावजूद इसके मायावती जी ने जून 2019 में यानि गठबंधन के एक महीने बाद ही सपा से यह कहकर नाता तोड़ लिया कि सपा का वोट बसपा के पक्ष में ट्रांसफर नहीं हुआ।

2022 में बसपा ने यूपी में अकेले दम पर ताल ठोंकी और एक सीट ही जीतने में कामयाब रही। जबकि सपा यूपी में मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी। 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में भी मायावती जी ने खासतौर पर यूपी में सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे, नतीजा फिर वही रहा 2014 की ही तरह एक बार फिर लोकसभा चुनाव में बसपा शून्य पर ही रही। यानि एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हो पायी।

घर में बैठकर ही पार्टी चला रहीं मायावती

उनका कहना है कि आश्चर्यजनक स्थिति यह है कि आज भी मायावती जी की जिद के कारण न तो संगठन को मजबूत करने और न ही संगठन के विस्तार करने पर कोई काम हो रहा है। मायावती जी घर में बैठकर ही पार्टी की गतिविधियों का संचालन कर रहीं हैं। मायावती जी द्वारा संगठन को मजबूत करने की दिशा में कोई प्रयास न करने के कारण दलित, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समाज इस आंदोलन से लगभग अलग हो चुका है।

आज देश में वर्तमान भाजपा सरकार की नीतियों के कारण महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक संकट उत्पन्न हो चुका है। जगह-जगह आंदोलन चल रहे हैं। देश की मुख्य पार्टी सपा-कांग्रेस विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर आंदोलन चला रहे हैं। किसान, छात्र अपनी समस्याओं को लेकर आंदोलित हैं, लेकिन बसपा का इन आंदोलनों से किसी भी प्रकार का कोई लेनादेना नहीं रह गया है। अगर बसपा का कोई नेता किसी आंदोलन में शामिल होता है तो उसे पार्टी से निष्कासित कर दिया जाता है।

कुंवर फ़तेह बहादुर ने कहा कि मायावती जी परिवारवाद में इतना ज्यादा जकड चुकी हैं कि अब उन्हें ना तो  कांशीराम जी द्वारा दिलाई गयी शपथ और और ना ही बहुजन मिशन की कोई फिक्र है, उनके इन्हीं कार्यों से पार्टी का जनाधार काफी कमजोर हुआ है और धीरे-धीरे करके बहुजन आन्दोलन से निकली पार्टी समाप्ति की ओर बढ़ रही है, जो बहुजन समाज के लिए चिंता की बात है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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