बसपा के सामने यूपी में अपना वोट बैंक बढ़ाने की कड़ी चुनौती
कमल जयंत
बसपा की असली अग्नि परीक्षा उत्तर प्रदेश में एक साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में होगी। बसपा प्रमुख ने पहले ही घोषणा कर रखी है कि यूपी में वह किसी भी दल के साथ किसी भी तरह का कोई गठबंधन नहीं करेंगी और सारी सीटों पर अकेले चुनाव लड$कर एक बार फिर 2007 दोहराएंगी यानि अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएंगी। जबकि पिछले लोकसभा चुनाव में यूपी या किसी अन्य राज्य से भी लोकसभा की एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रही है। अब बसपा के सामने यूपी में अपना वोट बैंक बढ़ाने के साथ ही पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की भी कड़ी चुनौती है।

साथ ही विपक्ष यानि सपा और कांग्रेस मिलकर बसपा को भाजपा की बी टीम बता रहा है, रैली में मायावती जी द्वारा राज्य की भाजपा सरकार व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ करने से उनकी यह बात दलित और मुस्लिम समाज काफी हदतक सही भी मान रहा है। बसपा नेतृत्व के सामने चुनाव के दौरान अपने ऊपर लग रहे भाजपा की बी टीम होने के दाग को साफ करने की भी चुनौती बरकरार है।
बीते साल बिहार में मिली आंशिक सफलता से बसपा में उत्साह
बिहार में बहुजन समाज पार्टी ने एक सीट पर जीत हासिल की है। लेकिन बसपा के मजबूत जनाधार को देखा जाए तो वहां एक सीट जीतने मात्र से पार्टी नेताओं में संतुष्टिï नहीं है। खुद मायावती जी भी कह चुकी हैं कि अगर बिहार में निष्पक्ष चुनाव होते तो पार्टी को भारी तादाद में वोट और सीटें दोनों मिलती। फिलहाल लंबे से बसपा का बिहार में कोई मजबूत जनाधार नहीं है। एक-एक करके उत्तर भारत के सभी राज्यों में पार्टी कमजोर होती जा रही है।

ऐसे में बिहार में एक सीट जीतने और डेढ़ फीसदी से अधिक वोट पाने से पार्टी नेतृत्व को इस बात का संतोष जरूर होगा कि जहां बिहार में कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल और राष्ट्रीय जनता दल जैसे बिहार के मजबूत दल की स्थिति इस चुनाव में बहुत ज्यादा दयनीय रही तो उनके मुकाबले बसपा की स्थिति फिर भी काफी अच्छी है। बसपा ने बिहार में सभी सीटों पर चुनाव लडऩे की बात कही थी और महज चालीस सीटों पर ही अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे। इसके अलावा इस चुनाव में बसपा प्रमुख मायावती या राष्ट्रीय मुख्य संयोजक आकाश आनंद की एक भी चुनावी सभा नहीं हुई। जबकि बिहार का चुनाव बसपा ने आकाश आनंद के नेतृत्व में लड़ा था।
बसपा के प्रमुख नेताओं की चुनाव में अनुपस्थिति के बावजूद पार्टी एक सीट पर जीती है। हालांकि नब्बे के दशक में उत्तर भारत के सभी राज्यों में बसपा का मजबूत जनाधार रहा है। जिसकी वजह से पार्टी को बहुत जल्दी ही मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल का दर्जा मिल गया था। लेकिन मौजूदा राजनीतिक हालात लगता है बसपा के पक्ष में नहीं हैं। नब्बे के दशक में देशभर में बसपा का आधार मजबूत हुआ। उसके पीछे एक वजह यह भी थी कि उस समय बसपा के संस्थापक जीवित थे और राजनीति में पूरी तरह से सक्रिय थे। उनकी रणनीति का ही नतीजा रहा कि पार्टी के गठन के दस साल के अंदर ही देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सपा से गठबंधन करके बसपा सरकार में सहयोगी बन गयी थी।
बिहार चुनाव के बाद अब एक साल बाद उत्तर प्रदेश में भी विधानसभा का चुनाव होना है। यूपी में मायावती के नेतृत्व में बसपा की चार बार सरकार रही और एक बार पूर्ण बहुमत की सरकार रही। लेकिन तेरह साल से बसपा यूपी में न सिर्फ सत्ता से बाहर है बल्कि पार्टी का प्रदर्शन भी बहुत ही निराशाजनक रहा है। मौजूदा समय में यूपी में बसपा का एक विधायक है और उसका वोट प्रतिशत तीस से घटकर नौ फीसद रह गया है। ऐसे में बसपा प्रमुख के लिए यूपी में अपने दम पर सरकार बनाना या सम्मानजनक सीटें हासिल करना बहुत बड़ी चुनौती है।

बहुजन समाज के महापुरुषों को घर से ही पुष्पांजलि देने के मायावती के फैसले को कितना स्वीकार करेगा बहुजन समाज
बीते साल यानि 2025 में नौ अक्टूबर को बहुजन नायक कांशीराम जी के महानिर्वाण दिवस के मौके पर बसपा ने एक बड़ी रैली का आयोजन किया था। माना जा रहा था कि इस रैली से बसपा नेतृत्व यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव के अभियान की शुरुआत करेगा, इस रैली में उमड़ी भारी भीड़ से पार्टी नेताओं, कार्यकर्ताओं और खासतौर पर बहुजन समाज के लोगों में खासा उत्साह था। मायावती जी ने छह दिसंबर को बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के महानिर्वाण दिवस के मौके पर भी यूपी में दो बड़ी रैलियों का आयोजन किया था, एक नोएडा में जहां वह रैली को खुद संबोधित करतीं और दूसरी लखनऊ के अम्बेडकर स्मारक में जहां बारह मंडलों के कार्यकर्ताओं की एक रैली होनी थी, लेकिन मायावती जी ने इस पुष्पांजलि अर्पित करने के कार्यक्रम में शिरकत नहीं की, इसके पीछे उन्होंने जो वजह बतायी है उसके मुताबिक उनके कार्यक्रमों में पहुंचने से आम जनता को काफी दिक्कतें होती हैं।
लिहाजा अब से वे महापुरुषों को श्रद्धांजलि अपने आवास पर ही देंगी। हालांकि बीते साल नौ अक्टूबर से पहले मायावती जी लंबे समय से महापुरुषों को अपने आवास से ही पुष्पांजलि अर्पित करतीं थीं। लखनऊ में रहते हुए वे पहले कभी कांशीराम जी की जयंती या महानिर्वाण दिवस के मौके पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने उनके स्मारक में नहीं गईं। इसी तरह बाबा साहब के जयंती या महानिर्वाण दिवस के मौके पर भी उन्होंने आवास से ही श्रद्धांजलि अर्पित की।
बहुजन नायक कांशीराम जी तो अवाम के साथ करते थे सीधा संवाद : फतेह बहादुर
वैसे इस संबंध में सामाजिक संस्था बहुजन भारत के अध्यक्ष एवं पूर्व आईएएस कुंवर फतेह बहादुर का कहना है कि रैलियों या कार्यक्रमों में कार्यकर्ताओं और आम जनता से सीधे संवाद का जो मौका मिलता है, उससे कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा होता है। अगर कोई नेता सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाना बंद कर दे तो जाहिर है उसका अपने समाज, आम जनता से सीधा संवाद खत्म हो जाएगा। ऐसी स्थिति में किसी भी दल का जनाधार कमजोर होना स्वाभाविक है। रही बात बसपा की तो बहुजन नायक कांशीराम जी अवाम के साथ सीधा संवाद करते थे, उनके दुख-दर्द और समस्याओं को समझते थे।

यही वजह रही कि बसपा के गठन के महज पांच साल में ही पार्टी यूपी में मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल हो गया था। जनता से संवाद खत्म करके राज्य में अपने दम पर सरकार बनाने की बात करना बेमानी होगी। बहुजन समाज से संवाद खत्म करने और बहुजनों के हितों की नीतियों से किनारा करने की वजह से ही बसपा शिखर से शून्य पर आ गयी है। नौ अक्टूबर की रैली से कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा हुआ था। मायावती जी का कार्यक्रमों में न जाने का निर्णय कार्यकर्ताओं के हौसले को कमजोर करने वाला है। इससे पार्टी को कोई फायदा तो नहीं होगा, लेकिन इसका बड़ा नुकसान जरूर होगा। बसपा प्रमुख ने महापुरुषों को श्रद्धासुमन अर्पित करने के लिए आयोजित कार्यक्रमों में शिरकत न करने का जो फैसला लिया है, उसके पीछे उनकी क्या रणनीति है, यह तो वह ही बता सकतीं हैं।