वकीलों के विरोध पर पुलिस ने किया लाठीचार्ज
लखनऊ। आखिरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट के हुक्म पर लखनऊ कचहरी, कलेक्ट्रेट और स्वास्थ्य भवन के गिर्द बरसों से बने गैर-कानूनी चैंबरों पर बुलडोजर चलाया गया। इसके विरोध में वकीलों ने जमकर हंगामा किया और चैम्बरों का तोडऩे के खिलाफ हंगामा शुरू कर दिया, देखते ही देखते वकीलों का यह विरोध आक्रामक रुख अख्तियार करने लगा।
हालात बिगड़ते देख पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। भीड़ को तितर-बितर करने और कार्रवाई में हो रही बाधा को रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। इस बीच वकीलों ने पुलिस की इस कार्रवाई का जमकर विरोध किया।

मालूम हो कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ फरमाया था कि सडक़, फुटपाथ और सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा अवाम की आवाजाही और अमन-ओ-अमान में रुकावट है।
बेशक, कानून से ऊपर कोई नहीं। अगर कब्जे व निर्माण गैर-कानूनी हैं तो हटाना लाजि़म है।
चैम्बर तोडऩे की इस कार्रवाई के मंज़र ने दिल दहला दिया। किसी ने रातों-रात अपना आशियाना खुद उजाड़ लिया। कोई फाइलें समेटता रहा, जैसे उम्र भर की मेहनत लम्हों में बिखर रही हो। कुछ लोग उम्मीद की शमा लिए बैठे रहे कि शायद कार्रवाई रुक जाए।

कहीं अखंड पाठ हुआ, कहीं दुआओं का सहारा लिया गया। कई लोग अफसरों के आगे दस्त-बस्ता फरियाद करते रहे कि थोड़ी मोहलत दे दी जाए।
सबसे दर्दनाक मंज़र वो था जब एक भाई-बहन ने फंदा डालकर कहा कि चैंबर टूटा तो जान दे देंगे। ये सिर्फ कार्रवाई नहीं थी, ये बेबसी की इंतेहा थी।
सवाल ये है: कानून का पालन ज़रूरी है, मगर क्या उससे पहले रियायत, मुनासिब मोहलत और इसके लिए अलग से इंतज़ाम होना चाहिए?
बुलडोजर तबाही ला सकता है, मगर अवाम का भरोसा तब बनता है जब इंसाफ के साथ इंसानियत भी महफूज़ रहे। ये वाक्या सिर्फ अतिक्रमण हटाना नहीं, बल्कि कानून, रोज़ी-रोटी, अकीदत और जज़्बात के टकराव की तस्वीर बन गया।
