बिरला, सांसद दुबे, पीएम मोदी व नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की भूमिका पर उठ रहे सवाल

आशीष वाजपेयी (वरिष्ठ पत्रकार)
लखनऊ। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की आत्मा कही जाने वाले भारतीय संसद की ऐसी जगहंसाई शायद ही कभी हुई हो जैसी पिछले चंद दिनों में हो गई। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान लोकसभा में इस बार जो घटित हुआ वह केवल पक्ष-विपक्ष के बीच का मामला नहीं रहा। राजनीतिक विश्लेषक, दशकों से संसद और राज्य विधान सभाओं के सदन की रिपोर्टिंग करते आए पत्रकारों, बुद्धिजीवियों को इस घटना ने भीतर तक हिला दिया है। हर तरफ सवाल यही है कि कौन है इसका सबसे बड़ा जिम्मेदार और अब मर्यादा की कौन सी सीमा बची है जिसका चीरहरण आगे होगा। यह चिंता रखने वाले इसके लिए जिसे सबसे ज्यादा जिम्मेदार मान रहे हैं, वह हैं लोकसभा के स्पीकर। इसके बाद भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और सवालों से बरी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी नहीं हैं।
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर केंद्रीय मंत्री सर्वानंद सोनेवाल ने जब लोकसभा में चर्चा शुरू की तो सबकुछ वैसा ही था जैसा सदन में ऐसी चर्चाओं के दौरान होता है, दिक्कत तब शुरू हुई जब भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या राष्ट्रवादी मुद्दों पर अपने दल की पीठ ठोंकते हुए कांग्रेस के कार्यकाल के दौरान का उदाहरण देते हुए उसकी राष्ट्र निष्ठा पर अंगुली उठाने लगे। यहां वह कब मर्यादा की सीमा रेखा लांग गए इस पर उस वक्त उतनी गंभीरता से नहीं सोचा गया। उन्होंने यूपीए सरकार (2004-2014) के दौर के राष्ट्रपति अभिभाषणों का हवाला देकर दावा किया कि उनमें राष्ट्रप्रेम, भारतीय संस्कृति, विरासत और सांस्कृतिक चेतना का जिक्र नहीं या बहुत कम था। बाद में राहुल गांधी ने अपने भाषण की शुरुआत में इसी बयान का जवाब देते हुए कहा कि “एक युवा सहयोगी (तेजस्वी सूर्या) ने कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाया है। मैं इस मुद्दे को उठाना नहीं चाहता था, लेकिन क्योंकि उन्होंने हमारी देशभक्ति और भारतीय संस्कृति की समझ पर सवाल उठाया है, इसलिए मैं कुछ पढ़ना चाहता हूं।”

राहुल ने पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की अप्रकाशित किताब के अंशों को कोट करने की कोशिश की
इसके बाद राहुल ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित किताब “फोर स्टार आफ डेस्टिनी” (जिसमें 2020 के लद्दाख/गलवान में चीन घुसपैठ और डोकलाम जैसे मुद्दों का जिक्र है) के अंशों को कोट करने की कोशिश की। यहां से शुरू हुआ विवाद तीन दिन तक संसद में हंगामा, फिर सांसद निशिकांत दुबे के अश्लील कहे जा रहे भाषण, प्रधानमंत्री के लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने के लिए न आने और लोकसभा अध्यक्ष द्वारा इसे संसद में ‘कुछ अप्रिय होने की आशंका’ के कारण प्रधानमंत्री को लोकसभा में न आने के आग्रह पर आकर थमी है।
सदन के पीठासीन अधिकारी के रूप में ओम बिरला की भूमिका सर्वोच्च होती है। वे सदन की व्यवस्था, नियमों का पालन और सदस्यों के बोलने के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार हैं। इस घटना में बिरला ने राहुल गांधी को पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित किताब से उद्धरण देने से रोका, जो नियम 349 के तहत सही था क्योंकि अप्रकाशित सामग्री का हवाला नहीं दिया जा सकता। लेकिन, इससे आगे की अव्यवस्था को रोकने में वे असफल रहे। जब भाजपा सांसद निशिकांत दूबे ने नेहरू-गांधी परिवार पर भड़काऊ टिप्पणियां कीं, तो उन्हें लंबे समय तक बोलने दिया गया, जिससे विपक्ष का गुस्सा भड़का। बाद में कुछ टिप्पणियां रिकार्ड से हटाई गईं, लेकिन क्षति हो चुकी थी। सबसे बड़ा फैसला था प्रधानमंत्री को सदन में न आने की सलाह देना। बिरला ने कहा कि विपक्षी सदस्यों (खासकर महिलाओं) द्वारा पीएम की सीट के पास प्रदर्शन से ‘अप्रिय घटना’ की आशंका थी, जो लोकतंत्र की परंपराओं को चोट पहुंचा सकती थी।

कैसे कोई मुखिया अपने परिवार के हिस्से से दूसरे हिस्से के लिए अप्रिय घटना की आशंका से घिर सकता है
यह सलाह संवैधानिक रूप से विवादास्पद है, क्योंकि अनुच्छेद 87(2) के तहत राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा में प्रधानमंत्री का जवाब अनिवार्य है। बिरला की यह कार्रवाई सदन की गरिमा को बचाने के नाम पर हुई, लेकिन इससे संसद की जगहंसाई बढ़ी। अगर वे पहले से अव्यवस्था को नियंत्रित करते या सभी पक्षों को संतुलित अवसर देते, तो स्थिति इतनी बिगड़ती नहीं। उनकी जिम्मेदारी सबसे ज्यादा है क्योंकि सदन का नियंत्रण उनके हाथ में था। वे सांसदों के परिवार के मुखिया हैं। कैसे कोई मुखिया अपने परिवार के हिस्से से दूसरे हिस्से के लिए अप्रिय घटना की आशंका से घिर सकता है। ऐसी स्थिति में तो मुखिया को अपने पद पर बने रहने का अधिकार ही नहीं होना चाहिए।
निशिकांत दूबे के भाषण ने आग में घी का काम किया। राहुल गांधी के अप्रकाशित किताब के उद्धरण पर विवाद के बीच दूबे ने चर्चा में हिस्सा लेते हुए ‘एडविना एंड नेहरू’, ‘मित्रोखिन आर्काइव्स’ जैसी किताबों से नेहरू-गांधी परिवार पर व्यक्तिगत और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। यह राहुल के हमले की प्रतिक्रिया था, लेकिन इससे सदन में हंगामा मच गया। विपक्ष ने इसे ‘निजी हमला’ बताकर प्रदर्शन किया, कागज फाड़े और स्पीकर से दूबे के खिलाफ कार्रवाई मांगी। परिणामस्वरूप, आठ विपक्षी सांसद निलंबित हुए और सदन कई बार स्थगित हुआ। दूबे की यह कार्रवाई संसदीय मर्यादा के खिलाफ थी, क्योंकि नियमों के तहत व्यक्तिगत आरोप बिना सबूत के नहीं लगाए जा सकते। उनके भाषण ने विवाद को राजनीतिक रंग दिया, जिससे विपक्ष ने पीएम के भाषण को रोकने की धमकी दी। अगर दूबे ने संयम बरता होता और चर्चा को मुद्दों तक सीमित रखा होता, तो शायद हंगामा इतना नहीं बढ़ता। उनकी जिम्मेदारी इसलिए ज्यादा है क्योंकि उन्होंने जानबूझकर विवाद को भड़काया, जो संसद की जगहंसाई का प्रमुख कारण बना।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनुपस्थिति ने संसद की परंपरा को तोड़ा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनुपस्थिति ने संसद की परंपरा को तोड़ा। पहली बार 2004 के बाद राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव बिना पीएम के जवाब के पास हुआ। मोदी ने स्पीकर की सलाह पर सदन में नहीं आने का फैसला लिया, लेकिन यह उनकी जिम्मेदारी थी कि वे संवैधानिक दायित्व निभाते। विपक्ष ने आरोप लगाया कि पीएम ‘डर’ से नहीं आए, जबकि मोदी ने कांग्रेस पर राष्ट्रपति का अपमान करने का आरोप लगाया। हालांकि, स्पीकर ने सुरक्षा की आशंका जताई, लेकिन पीएम के रूप में मोदी सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए वैकल्पिक तरीके अपना सकते थे, जैसे वीडियो के जरिए या बाद में जवाब देना। उनकी अनुपस्थिति ने विपक्ष को हमला करने का मौका दिया और संसद को कमजोर दिखाया। जिम्मेदारी इसलिए है क्योंकि वे सरकार के प्रमुख हैं और सदन के प्रति जवाबदेह। लेकिन स्पीकर की सलाह के कारण उनकी भूमिका अप्रत्यक्ष है।
राहुल गांधी ने विवाद की शुरुआत की, लेकिन उनकी जिम्मेदारी भी बनती है
राहुल गांधी ने विवाद की शुरुआत की, लेकिन उनकी जिम्मेदारी भी बनती है। उन्होंने नरवणे की अप्रकाशित किताब से उद्धरण देकर भारत-चीन सीमा विवाद पर सरकार की आलोचना की कोशिश की, जो नियमों के खिलाफ था। स्पीकर ने इसे रोका, लेकिन राहुल ने किताब की प्रकाशित कापी दिखाकर अपना पक्ष रखा और पीएम पर आरोप लगाया कि वे सदन में नहीं आएंगे। विपक्ष के रूप में उनकी भूमिका सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना है, लेकिन अप्रकाशित सामग्री का इस्तेमाल गलत था। इससे हंगामा हुआ, लेकिन राहुल ने स्पीकर को पत्र लिखकर बोलने का अधिकार मांगा, जो लोकतांत्रिक था। उनकी कार्रवाई ने जगहंसाई में योगदान दिया, लेकिन मुख्य जिम्मेदारी सदन प्रबंधन की है। अगर वे नियमों का पालन करते, तो शायद विवाद टल जाता।
शायर बशीर बद्र का एक शेर है कि – दुश्मनी जमके करो पर इतनी गुंजाइश रहे, जब कभी दोस्त बन जाएं तो शर्मिंदा न हों। संसद में अभिभाषण प्रस्ताव के समय जो कुछ हुआ उससे लगता है कि अब सारी गुंजाइशें खत्म हो गई हैं और दाग स्थायी बन गया है।