पुराने रिहायशी इलाकों में भी हरियाली का सवाल अहम

अली हसन (वरिष्ठ पत्रकार)
लखनऊ सिर्फ एक शहर नहीं है, यह एक तहज़ीब है—नफासत, नज़ाकत और नज़्म-ओ-सकून की पहचान। बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा, रूमी दरवाज़ा, रेजि़डेंसी और पुराने मोहल्ले इस शहर की रूह हैं। हर साल, ख़ासतौर पर गर्मियों की छुट्टियों में, देश-विदेश से हज़ारों सैलानी इन हेरिटेज ज़ोन की तरफ रुख़ करते हैं। लेकिन आज इन ऐतिहासिक इलाकों में एक अहम कमी साफ नज़र आती है—साये की कमी। गर्मी का मौसम दस्तक देने वाला है।

अप्रैल से जून के बीच जब लखनऊ का तापमान 40 से 45 डिग्री तक पहुँच जाता है, तब हेरिटेज ज़ोन में घूमने वाले सैलानियों, बुज़ुर्गों, बच्चों, फोटोग्राफरों, गाइड्स और छोटे दुकानदारों के लिए हालात बेहद मुश्किल हो जाते हैं।
छोटा इमामबाड़ा और उसका आसपास का इलाका जहाँ दिन भर पर्यटकों की आमद-ओ-रफ़्त रहती है, वहाँ खुले मैदान, पत्थर के रास्ते और धूप से तपते अहाते हैं, लेकिन छायादार पेड़ों की शदीद कमी है।
न तो पैदल चलने वालों के लिए राहत है, न बैठकर सुस्ताने की मुकम्मल व्यवस्था। क्या हमारी विरासत केवल देखने की चीज़ है, या उसे महसूस करने के लिए इंसानी सहूलियत भी ज़रूरी है? अक्सर यह दलील दी जाती है कि हेरिटेज इमारतों के पास पेड़ लगाने से संरचनाओं को नुकसान हो सकता है। लेकिन यह आधा सच है। सही प्रजातियों के देशी, कम जड़ फैलाव वाले और छायादार पेड़ न केवल सुरक्षित होते हैं, बल्कि हेरिटेज संरचनाओं की शान बढ़ाते हैं।
लखनऊ में डिजिटल इंफ्ऱास्ट्रक्चर पर काम हो रहा
दुनिया के कई ऐतिहासिक शहर—इस्तांबुल, इस्फहान, रोम इसका बेहतरीन उदाहरण हैं, जहाँ विरासत और हरियाली एक-दूसरे की हिफाज़त करते हैं। लखनऊ स्मार्ट सिटी मिशन और नगर निगम द्वारा शहर में चौराहों का सौंदर्यीकरण, सडक़ चौड़ीकरण, हेरिटेज वॉक, गोमती रिवर फ्रंट और डिजिटल इंफ्ऱास्ट्रक्चर पर काम हो रहा है। लेकिन अगर इन योजनाओं में हेरिटेज ज़ोन के लिए हरियाली को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो स्मार्ट सिटी की परिकल्पना अधूरी रह जाएगी। स्मार्ट सिटी का मतलब सिर्फ कैमरे, एलईडी लाइट और ऐप्स नहीं होता। एक असल स्मार्ट शहर वह होता है जहाँ सैलानी धूप से बेहाल न हों। बुज़ुर्ग सुकून से बैठ सकें, बच्चे सुरक्षित माहौल में घूम सकें और शहर की फज़ा इंसानों के लिए मेहरबान हो।
विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करना गलत
ख़ासतौर पर छोटा इमामबाड़ा, बड़ा इमामबाड़ा के बाहरी क्षेत्र, रूमी दरवाज़ा से जुड़े पैदल मार्ग और हेरिटेज वॉक रूट्स पर: देशी छायादार वृक्षों का वैज्ञानिक चयन, बड़े गमलों और ग्रीन कॉरिडोर का इस्तेमाल हरित विश्राम स्थल (ग्रीन रेस्ट पॉइंट्स),पत्थर और कंक्रीट की गर्मी कम करने वाला लैंडस्केप डिज़ाइन जैसे उपाय बिना विरासत को नुकसान पहुंचाए लागू किए जा सकते हैं। हेरिटेज ज़ोन के साथ-साथ हज़रतगंज, आलमबाग, अलीगंज, गोमतीनगर और पुराने रिहायशी इलाकों में भी हरियाली का सवाल उतना ही अहम है। विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करना गलत है, दोनों का साथ चलना ही लखनऊ की पहचान को बचा सकता है। पेड़ सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं हैं, यह सेहत, तहज़ीब और तहम्मुल का सवाल है। जो शहर अपने मेहमानों को साया नहीं दे सकता, वह अपनी विरासत की पूरी मेज़बानी भी नहीं कर सकता।
गर्मी आने वाली है, सैलानी आने वाले हैं- यह सही वक्त है कि नगर निगम, स्मार्ट सिटी प्राधिकरण और पर्यटन विभाग मिलकर हेरिटेज ज़ोन में हरियाली को इमरजेंसी नहीं, बल्कि नीति का हिस्सा बनाएं।