दलितों ने फिजूलखर्ची रोकने को ‘तेरहवीं’ प्रथा का किया बहिष्कार

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दलित समाज की तरफ से कोरी बिरादरी की पहल ने पेश की सामाजिक सुधार की अनूठी नजीर

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के ग्राम बजेहटा में कोरी समाज द्वारा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक क्रांतिकारी निर्णय लिया गया है। प्रख्यात समाजसेवी स्व. मइयादीन कोरी (90 वर्ष) के निधन के पश्चात उनके परिवार और समाज के प्रबुद्धजनों ने सर्वसम्मति से उनकी ‘तेरहवीं’ (त्रयोदशी) संस्कार न करने का निर्णय लेकर समाज को एक प्रगतिशील संदेश दिया है। मूल निवासी ग्राम बजेहटा, हमीरपुर के मइयादीन कोरी का गत रविवार (21 दिसंबर 2025) को कानपुर के हैलेट अस्पताल में इलाज के दौरान निधन हो गया था। सोमवार, 22 दिसंबर को परिजनों ने उनके पार्थिव शरीर को अपने निजी खेत में दफनाकर अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की। शोक की इस घड़ी में भी परिवार ने साहस दिखाते हुए पुराने ढर्रे की खर्चीली परंपराओं को तोडऩे का फैसला किया।

वैचारिक क्रांति और सामूहिक निर्णय

अंतिम संस्कार के पश्चात आयोजित विचार-विमर्श में परिवार के सदस्यों और समाज के गणमान्य व्यक्तियों ने हिस्सा लिया। उत्तर प्रदेश कोरी समाज सेवा संस्थान (लखनऊ) के अध्यक्ष राम सजीवन कोरी के नेतृत्व में यह निर्णय लिया गया कि समाज में व्याप्त ‘तेरहवीं’ जैसी खर्चीली और अनावश्यक परंपराओं को बंद किया जाना चाहिए। इस ऐतिहासिक निर्णय में मुख्य रूप से शिव प्रसाद कोरी (सेवानिवृत्त पुलिस सब इंस्पेक्टर,- छोटे भाई), गजराज कुटार, रघुराज कुटार (अध्यापक) एवं शिवराज कुटार (पुत्रगण), सुखराम कोरी (पुखरायां), अरविन्द कुटार (अध्यापक), मुन्ना लाल, गनेश प्रसाद, गंगा प्रसाद एवं राम किशोर ने अपनी सहभागिता निभाई।

समाज से अपील

इस अवसर पर उत्तर प्रदेश कोरी समाज सेवा संस्थान के अध्यक्ष राम सजीवन कोरी ने कहा कि ‘मृत्यु भोज जैसी अमानवीय और फिजूलखर्ची से भरी परंपराएं गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ डालती हैं। हमें अपने विवेक का परिचय देते हुए ऐसी कुरीतियों का त्याग करना चाहिए। मइयादीन जी को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके द्वारा शुरू की गई इस वैचारिक क्रांति को घर-घर तक पहुंचाएं। ‘ प्रेस के माध्यम से कोरी समाज के समस्त भाई-बहनों से निवेदन किया गया है कि वे इस पहल का अनुकरण करें और समाज को आर्थिक व मानसिक गुलामी से मुक्त कराने में अपना योगदान दें।

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