निशाने पर क्रिसमस : संविधान और डर के बीच खड़ा भारत

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देश में कानून पर भारी पड़ता उग्र भीड़तंत्र

              अनिरुद्ध सिंह 

         (समाजवादी पार्टी )

भारत के कई हिस्सों में हाल के दिनों में जो घटा, वह गहराई से विचलित करने वाला है। जहां रोशनी, और सामूहिक खुशी होनी चाहिए थी, वहां टूटी सजावटें, बाधित उत्सव और भय का माहौल दिखाई दिया। क्रिसमस ट्री गिराए गए, कार्यक्रम रोके गए और खुशी को उकसावे के रूप में देखा गया—ये घटनाएं संयोग नहीं, बल्कि उस बढ़ते चलन की ओर संकेत करती हैं जहां सार्वजनिक डराने-धमकाने को वैचारिक दावों के सहारे जायज़ ठहराया जा रहा है। इसी बीच, क्रिसमस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक चर्च का दौरा कर प्रेम, सेवा और भाईचारे की बात की। लेकिन जब उन्हीं दिनों देश के कई हिस्सों से क्रिसमस समारोहों के दौरान हिंसा, डराने-धमकाने और व्यवधान की खबरें आती हैं, तो ये शब्द औपचारिकता से आगे नहीं बढ़ पाते। सद्भाव की भाषा तब अर्थ खो देती है, जब राज्य न तो भय फैलाने वालों को रोकता है और न ही पीडि़तों को सुरक्षा देता है। और भी चिंताजनक यह है कि केरल को छोडक़र ऐसी अधिकांश घटनाएं भाजपा-शासित राज्यों में दर्ज हुईं—जो राष्ट्रीय स्तर पर सौहार्द के दावों और ज़मीन पर सरकारों की कार्रवाई, या निष्क्रियता, के बीच एक गहरे राजनीतिक विरोधाभास को उजागर करती हैं।

सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि कई जगहों पर यह तोडफ़ोड़ स्कूल के छोटे-छोटे बच्चों के सामने हुई, जो मासूमियत से क्रिसमस मना रहे थे। उनके लिए यह उत्सव नहीं, बल्कि डर, भ्रम और मानसिक आघात का अनुभव बन गया। विकसित होती उम्र में ऐसा अनुभव किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। यह मुद्दा केवल क्रिसमस या ईसाई समुदाय तक सीमित नहीं है। यह इस प्रश्न से जुड़ा है कि भारत किस दिशा में आगे बढ़ रहा है—और क्या हमारा संविधान अब भी हमारे साझा सार्वजनिक जीवन का मार्गदर्शन कर रहा है।

भारत का संविधान इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट है। नागरिकता, कानून और शासन, धर्म से ऊपर हैं। राज्य का दायित्व है कि वह सभी धर्मों की समान रूप से रक्षा करे और यह सुनिश्चित करे कि सार्वजनिक स्थान कानून से संचालित हों, न कि धमकी या बल प्रयोग से। अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है और अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करता है। ये कोई सैद्धांतिक आदर्श नहीं, बल्कि वही आधार हैं जिन पर विविधताओं से भरा यह देश टिका है। आज कुछ व्यक्ति और समूह यह तय करने लगे हैं कि सार्वजनिक रूप से कौन-सा उत्सव ‘स्वीकार्य ‘है। उन्हें यह अधिकार किसने दिया? निश्चित रूप से संविधान ने नहीं। जब तोडफ़ोड़ जैसी हरकतों को आस्था की अभिव्यक्ति कहकर बचाव मिलता है या नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, तो यह केवल कानून को नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देता है।

मेरी पीढ़ी—जो 80 और 90 के दशक में बड़ी हुई — के लिए यह सब अपरिचित सा लगता है। तब त्योहार डर का कारण नहीं होते थे। दिवाली, ईद, क्रिसमस और गुरुपर्व साथ-साथ मनाए जाते थे। किसी को यह साबित नहीं करना पड़ता था कि उसकी आस्था सही है या उसका देशप्रेम प्रमाणित है। बदला धर्म नहीं है, बदली है राजनीति में उसकी भूमिका और इस्तेमाल। तोडफ़ोड़, धमकी और डर फैलाना किसी भी हालत में धार्मिक आचरण नहीं हो सकता। ये अपराध हैं —कानूनन दंडनीय अपराध। लेकिन जब इन्हें ‘भावनाओं’ या ‘गलतफहमी’ कहकर टाल दिया जाता है, तो राज्य अपने सबसे बुनियादी कर्तव्य से पीछे हटता दिखाई देता है—सभी नागरिकों की समान सुरक्षा और कानून का निष्पक्ष पालन।

इससे भी अधिक चिंताजनक है समाज की भूमिका। ऐसी घटनाओं के दौरान कई लोग तमाशबीन बने रहते हैं और अपने नैतिक दायित्व के बावजूद हस्तक्षेप नहीं करते। यह सामूहिक चुप्पी भीड़ की हिंसा जितनी ही ख़तरनाक है। और जब इसी चुप्पी के साथ कानून लागू करने वाली एजेंसियां भी निष्क्रिय रहती हैं, तो यह संदेश जाता है कि अपराध को रोका नहीं जाएगा, बल्कि सहन किया जाएगा। मौजूदा सरकारी प्रतिक्रिया इस चिंता को और गहरा करती है—जहां गिरफ़्तारियां देर से होती हैं या होती ही नहीं, शिकायतें कमज़ोर कर दी जाती हैं और राजनीतिक नेतृत्व मौन साध लेता है। यह संरक्षण और मौन साल-दर-साल ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देता है, जहाँ कुछ लोग तथाकथित हिंदुत्व संगठनों की सरपरस्ती और पहचान पाने के लिए कानून को पैरों तले रौंदते हुए सार्वजनिक हिंसा, डर और तोडफ़ोड़ को अपनी राजनीतिक योग्यता का प्रदर्शन बना चुके हैं—जैसे नफरत फैलाना ही उनका चयन-परीक्षण हो। भारत की कल्पना कभी ऐसे देश के रूप में नहीं की गई थी जहाँ शासन धर्म के दबाव में झुक जाए या राजनीतिक विचारधारा संवैधानिक नैतिकता से ऊपर हो। डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने चेताया था कि संवैधानिक नैतिकता के बिना लोकतंत्र नहीं टिक सकता। आज कानून का चयनात्मक प्रयोग और डर को सामान्य बना देना उसी गिरावट की ओर संकेत करता है।

कोई भी विचारधारा, चाहे वह कितनी भी लोकप्रिय क्यों न हो, संविधान से ऊपर नहीं हो सकती। आज यदि किसी एक समुदाय की सार्वजनिक अभिव्यक्ति को निशाना बनाया जाता है, तो कल यही खतरा सभी की सांस्कृतिक और नागरिक स्वतंत्रताओं पर मंडराएगा। इसकी कीमत एक नहीं, बल्कि पूरा समाज चुकाता है। भारत की विविधता हमेशा उसकी ताकत रही है। लेकिन विविधता तभी जीवित रहती है जब राज्य उसकी रक्षा करे। अगर सरकारें बढ़ते डर और दबाव के सामने चुप रहेंगी, तो यह दौर एक छोटी गलती नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से मुँह मोडऩे के रूप में याद किया जाएगा। सरकार के सामने दायित्व स्पष्ट है: बिना पक्षपात कानून लागू करना, दोषियों पर सख़्त कार्रवाई करना और यह स्पष्ट संदेश देना कि राजनीतिक सुविधा कभी भी संवैधानिक कर्तव्य से ऊपर नहीं हो सकती।
अंतत: सवाल सीधा है—क्या भारत कानून से शासित होगा, या भीड़ से? संविधान इसका उत्तर पहले ही दे चुका है। अब यह देखना है कि सत्ता में बैठे लोग उस उत्तर को लागू करने का साहस रखते हैं या नहीं।

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