गाँव की बात है समय था शाम का राही आता दिखाई दिया अन्जाने धाम का हमने आदतन पूछ लिया

मो. रफीक सलमानी (मामू)
इन्सान के मन में कितनी खोट हो गई सीधा-सादा था मैं इसलिए चोट हो गई
घर के बाहर चबूतरे पर गप्पे मार रहे थे पड़ोसियों के साथ बैठ समय गुज़ार रहे थे
गाँव की बात है समय था शाम का राही आता दिखाई दिया अन्जाने धाम का हमने आदतन पूछ लिया
कहाँ जाओगे राही बोला भटका हूँ क्या राह आप बताओगे शाम का समय है, ज़माना खराब है
रात यहीं ठहर जाओ समय ख़राब है हमने सोचा लुट जायेगा अन्जान है कोई
आख़िर हमारी तरह ये भी इन्सान है कोई हमने कहा भाई आपका भोजन बनवाता हूँ
अजनबी बोला, मैं सबके यहाँ का नहीं खाता हूँ हमने कहा पड़ोस में आपका खाना बनवायेंगे
चिन्ता न करें आपको उन्हीं के बर्तनों में खिलायेंगे बेचारा पड़ोसी बर्तनों में देकर चला गया
खाना सुबह भेज देंगे बर्तन ये कह उसे कर दिया रवाना राही ने बड़े प्रेम से खूब खाना खाया
अपने हाथों हमने भी उनका बिस्तर लगाया दे दी जो हमारे पास इकलौती खाट थी रात भर सोये
उस पर हम जो फटी टाट थी अजनबी ने खाना खाया और सो गया हमारा मन भी मीठे सपनों में खो गया
मन सन्तुष्ट था कि हमने उपकार किया है नहीं मालूम था कि उसे रोक कर सर दर्द लिया है

सुबह हुई तो टूट गया स्वप्न सुहाना हमने सर पीट लिया क्या आया है जमाना
उठ के जब देखा तो खाट खाली थी उस अजनबी की ये अदा भी निराली थी
बर्तन पड़ोसी के और मेरा बिस्तर भी गया जिसमे दिया था सूखा आटा वो कनस्तर भी गया
पड़ोसी सुबह आया मेरे जनाब बर्तन लाईये मैंने कहा भाई ज़ोर-ज़ोर न चिल्लाईये
आपके बर्तन ही गये मेरा तो बिस्तर भी गया और तो गया ही जो कुछ आटे का कनस्तर भी गया
पड़ोसी बोला मैं नहीं जानता मेरे बर्तन दीजिए ऐसे उपकार का फल आप ही लीजिये
वो उतारू हो गया मरने, मारने पर लोग जमा हो गये उसके पुकारने पर पड़ोसी बोले
आपको दंड देना पड़ेगा मेहमान आपका था आपको ही सहना पड़ेगा
ज़ात के चक्कर ने जुदा कर दिया इन्सान को शरण दी मेहमान को ना दी थी किसी शैतान को
बिन बात का पड़ोसी से मेरा झगड़ा हो गया जो पड़ेसियों के साथ सद्भाव था वो भी खो गया
क्या किसी पर अब भरोसा करना चाहिये ये सोच सोचकर मेरा तो दिल रो गया
काश वो मेरे यहाँ का बना खाना खाता तो पड़ोसी क्यों मेरे ऊपर डन्डा लेके आता
खाना भी खिलाया और बिस्तर भी खोया पड़ोसी ने मारा इस पर भी मैं बहुत रोया
समझ में नहीं आता कि अब क्या किया जाये इन्सानियत से बिल्कुल अब क्या मुँह चुरा लिया जाये
बिस्तर भी जो चुरा ले जाये उसे मेहमान कैसे कहूँ कौम के नाम पर कराये जो झगड़ा उसे इन्सान कैसे कहूँ
अब कभी हमारी जिन्दगी में न कभी ऐसा इन्सान आये ऐसी ख़ातिर से बाज़ आये न कभी ऐसा मेहमान आये
ख़राब की रात में नींद सुबह तक रह कर ले जाता दे देते “रफीक” तब भी अगर कह कर ले जाता