रोटी कमल चर्बी और 1857,  स्वतंत्रता संग्राम के कुछ दबे हुए पृष्ठ : देव कबीर

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1857 का विद्रोह जिसे भारतीयों ने स्वतंत्रता संग्राम कहा तो अंग्रेजों ने इसे गदर अथवा म्युटनी कहा,  मिर्जा गालिब ने बगावत कहा तो सर सैयद अहमद खान ने सरकशी कहा

लेखक,शोधकर्ता एवं संपादक –  देव कबीर (कानपुर)

1857 का विद्रोह जिसे भारतीयों ने स्वतंत्रता संग्राम कहा तो अंग्रेजों ने इसे गदर अथवा म्युटनी कहा। मिर्जा गालिब ने बगावत कहा तो सर सैयद अहमद खान ने सरकशी कहा।

इस संग्राम के संबंध में मैंने अपनी नव प्रकाशित पुस्तक में कुछ ऐसी नई बातें कही हैं या सत्य उजागर किए हैं, उन पृष्ठों को खोलने और पलटने की कोशिश की है।

जिनके बारे में मुझसे पहले किसी इतिहासकार या लेखक ने प्रयास नहीं किया ये बातें दलितों, आदिवासियों तथा पिछड़ी जाति के आम लोगों, वीरों, लड़ाकों, शहीदों की  इस आजादी की जंग में महत्वपूर्ण योगदानों से संबंधित हैं।

बेशक मंगल पांडे ने बगावत की, परंतु उसे बगावत का सूत्रधार दमदम के कारखाने में काम करने वाला एक खलासी था। जिसे लेखकों इतिहासकारों ने अछूत, हरिजन, नीची जाति का हिंदू, मेहतर आदि कहा है।

स्वतंत्रता संग्राम पर किसी भारतीय द्वारा लिखी जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण और पहली पुस्तक “भारत में अंग्रेजी राज” के लेखक पं. सुंदरलाल (श्रीवास्तव) ने दमदम के कारखाने के उस खलासी को मेहतर बताया था। 1857 का स्वातंत्र्य समर पुस्तक के लेखक सावरकर ने भी मेहतर ही कहा है। इतिहासकार मन्मथ नाथ गुप्त भी उस खलासी को मेहतर ही मानते हैं।

इतिहासकार एसएन सेन नीची जाति का लश्कर लिखते हैं तो जलीस आबिद सिददीकी  उस खलासी को नीची जाति का मजदूर बताते हैं। आचार्य भगवन देव अपनी पुस्तक भारत के क्रांतिकारी में उसे अछूत खलासी मातादीन भंगी लिखते हैं।

जिसका अनुसरण दलित तथा वामपंथी लेखक करते चले जाते हैं। सुभाष गताड़े,कंवल भारती, सूरजपाल चौहान,एम एल विद्रोही, डी सी डिंकर, बौद्धाचार्य सजीवन नाथ, एडवोकेट अनूप कल्याणी यहां तक खुद मैंने भी 2016 में स्व प्रकाशित पुस्तक – “1857 के जंगी प्रथम शहीद मातादीन भंगी” में इसी वैचारिक परंपरा को आगे बढ़ाया है।

(पुस्तक का अगला अंश जल्द )

 

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