चुनाव नजदीक आया तो सपा-कांग्रेस मनाने लगे कांशीराम जयंती
लखनऊ। बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि सपा-कांग्रेस के दलित चमचे चुप ही रहें तो बेहतर होगा। उन्होंने कहा कि यूपी में विधानसभा चुनाव करीब हैं। इसी को ध्यान में रखकर सपा और कांग्रेस दोनों ही दलितों को रिझाने में जुट गये हैं। उनका कहना है कि चुनाव नजदीक आता देख दोनों दलों का कांशीराम की जयंती और उन्हें भारत रत्न दिलाने की याद आ गई।
उन्होंने कहा कि सपा-कांग्रेस हमेशा से दलित विरोधी पार्टियां रही हैं। लेकिन इस बार यूपी विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही इन्हें दलित वोटों की चिंता सताने लगी। यही कारण है कि ये दल अचानक कांशीराम जयंती मनाने लगे। सपा-कांग्रेस की असलियत जाननी हो तो कांशीराम की लिखित ‘चमचा युग’ किताब पढऩी चाहिए। दरअसल, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी 13 मार्च को लखनऊ आए थे। उन्होंने कांशीराम जयंती मनाई। राहुल की मौजूदगी में कांग्रेस नेताओं ने कांशीराम को भारत रत्न देने का प्रस्ताव पास किया गया। खुद राहुल ने भी पीएम मोदी को लेटर लिखकर भारत रत्न देने की डिमांड की थी।कांग्रेस की तरह सपा ने भी सोची-समझी रणनीति के तहत कांशीराम की जयंती मनाई है। यूपी विधानसभा चुनाव में उन्हें दलित वोटों के स्वार्थ ने ऐसा करने पर मजबूर किया। कांग्रेस-सपा की शुरू से ही बसपा को खत्म करने की मंशा रही है। कांशीराम ने खुद बसपा पार्टी की नींव रखी थी। उन्होंने ही मुझे अपने जीते-जी अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। वर्तमान में मैं बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष हूं। और मेरे रहते हुए बसपा पार्टी को कोई हिला भी नहीं सकता। ऐसा लगता है कि इन पार्टियों के महापुरुषों में कोई जान नहीं रही है। इसी कारण ये हमारे महापुरुषों को भुनाने में लगे हैं। जबकि कांशीराम के जीते-जी हर मामले में हमेशा इन पार्टियों ने उनकी उपेक्षा की थी।
मैंने खुद भारत रत्न देने की मांग की थी, कांग्रेस ने नहीं दिया
मायावती ने कहा कि कांशीराम का निधन हुआ तो केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। मैंने खुद 2007 में केंद्र से कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग की थी। तब कांग्रेस के नेता बोलते थे कि ये सम्मान राष्ट्रीय स्तर पर योगदान देने के लिए दिया जाता है। आज इनके नेता राहुल गांधी को अचानक कांशीराम में दिलचस्पी जाग गई। अपनी केंद्र की सरकार में रहकर भारत रत्न की उपाधि न देकर अब दूसरी पार्टी की सरकार से देने की मांग करना हास्यास्पद नहीं तो क्या है? दलितों ने आजादी के बाद से कांग्रेस को ही वोट दिया। लेकिन बदले में कांग्रेस ने क्या किया? वह हमेशा वोट तो दलितों से लेती थी, लेकिन कुर्सी पर उन्हें नहीं बैठाती थी। कांग्रेस ने हमेशा सिर्फ दलितों को वोटबैंक ही समझा। ये तो कांशीरामजी थे, जिन्होंने रात-दिन एक करके दलितों के स्वाभिमान को जगाया और बसपा जैसी राजनीतिक पार्टी की स्थापना कर दलितों को उनकी राजनीतिक ताकत का अहसास कराया।