सपा शासन में दलितों के दमन की सियाह लकीर : डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल

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यूपी में जब भी सपा की सत्ता आयी, दलित वर्ग के प्रति हिंसा, प्रशासनिक उपेक्षा और अत्याचार के मामले उल्लेखनीय रूप से बढ़े

डॉ. अम्बेडकर महासभा के अध्यक्ष व सदस्य विधान परिषद डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल का कहना है कि सत्ता केवल शासन करने का अधिकार नहीं होती, वह एक सामाजिक संदेश भी है। जब कोई दल सत्ता में आता है, तो वह केवल सरकार नहीं बनाता, वह यह अधिकार भी हासिल कर लेता है कि किसकी पीड़ा सुनी जाए और किसकी नहीं, अपराध के लिए किसे दंडित किया जाए और किसे क्षमा। आदर्श तो यह है कि हर पीड़ित की सुनी जाए और हर अपराधी को सजा मिले, लेकिन उत्तर प्रदेश के संदर्भ में लंबे समय तक यह आदर्श स्थिति गायब रही। बात उस पार्टी के शासनकाल की हो रही है, जिसने सत्ता का चरित्र जाति के धागे से बुना। संविधान ने भले ही सबको बराबर घोषित किया हो, लेकिन जब सत्ता जाति की छाया में काम करने लगती है तो संवैधानिक समानता एक लिखित वाक्य से अधिक नहीं रह जाती। उत्तर प्रदेश इस विरोधाभास की सबसे बड़ी प्रयोगशाला रहा है, और समाजवादी पार्टी उसका सबसे बड़ा उदाहरण। इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी समाजवादी पार्टी सत्ता में आई, ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में दलित वर्ग के प्रति हिंसा, प्रशासनिक उपेक्षा और अत्याचार के मामले उल्लेखनीय रूप से बढ़े।

मुलायम सिंह यादव ने जाति को तोड़ने के लिए नहीं, जाति को भुनाने के लिए राजनीति की

डॉ. निर्मल का कहना है कि राममनोहर लोहिया ने जब पिछड़ों और दलितों को एक मंच पर लाने की कल्पना की थी, तो उनके मन में एक नैतिक राजनीति का स्वप्न था।

ऐसी राजनीति जो जाति को तोड़े, न कि जाति को अपना हथियार बनाए। लेकिन सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने लोहिया की विरासत को जिस ढंग से ग्रहण किया, उसमें दर्शन नहीं, केवल व्यूह-रचना थी। उन्होंने जाति को तोड़ने के लिए नहीं, जाति को भुनाने के लिए राजनीति की।

‘एम-वाई’ के रूप में यादव और मुसलमानों का गठजोड़ बनाया गया, दलितों को साथी नहीं, एक विरोधी दल विशेष का मतदाता समझा गया, और एक बार सत्ता मिलते ही यह स्पष्ट हो गया कि इस दल की प्राथमिकताओं में दलित कहीं नहीं थे। यही कारण रहा कि समाजवादी पार्टी के तीन शासनकाल में दलित उत्पीड़न की एक सियाह लकीर खिंच गई।

पुलिस-प्रशासन बने दलित उत्पीड़न के हथियार

डॉ. अम्बेडकर महासभा के अध्यक्ष ने कहा कि सपा शासन के इन तीनों कार्यकालों 1993-1995, 2003-2007 और 2012-2017 में दलित उपेक्षा व उत्पीड़न का स्थायी औजार बना पुलिस-प्रशासन। इस दौरान उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे में यादव समुदाय की उपस्थिति असंगत रूप से बढ़ी। थानेदार से लेकर जिलाधिकारी तक, तहसीलदार से लेकर राजस्व अधिकारी तक एक जाति-विशेष की प्रधानता ने पूरे तंत्र को एकपक्षीय बना दिया। यह केवल नियुक्तियों की बात नहीं थी, यह उस मानसिकता की बात थी जो इन नियुक्तियों के साथ थानों व दफ्तरों में प्रवेश कर जाती थी। जब कोई पीड़ित दलित थाने पहुंचता था, उसे वहां वही चेहरा मिलता था जो उसके उत्पीड़क का सजातीय भाई था। न्याय की उम्मीद दहलीज पर ही दम तोड़ देती थी।

इसी प्रशासनिक पक्षपात का स्वाभाविक परिणाम था एससी-एसटी एक्ट का निष्प्रभावी हो जाना। यह कानून दलितों और आदिवासियों के लिए एक कानूनी कवच था, लेकिन सपा शासनकाल में यह कवच तार-तार हो गया। बमुश्किल दर्ज होने वाले मुकद्मों में भी ‘फाइनल रिपोर्ट’ लगाने की दर तेजी से बढ़ी।

पीड़ित परिवार अदालतों के चक्कर लगाते थे, गवाह डराए जाते थे, और अपराधी खुलेआम घूमते रहते थे। यादव और मुस्लिम प्रभाव वाले इलाकों में यह प्रवृत्ति और भी मुखर थी।

जहां पुलिस ने पीड़ितों को ही समझौते के लिए विवश किया और आरोपियों को राजनीतिक संरक्षण दिलाया।

यहां तक कि मानवाधिकार आयोग को भी कई घटनाओं में संज्ञान लेना पड़ा। यह प्रशासनिक भेदभाव केवल पुलिस तक सीमित नहीं था।

बल्कि भूमि आवंटन, पट्टों पर कब्जे और ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में भी साफ तौर पर दिखाई देता था, जहां दलितों के हितों की अनदेखी कर सत्ताधारी दल के कोर वोटबैंक को प्राथमिकता दी जाती थी।

सत्ता का केंद्र बन गए थे दबंग

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज में भूमि और सामाजिक प्रतिष्ठा हमेशा से संघर्ष के मुख्य कारण रहे हैं। जैसे ही सपा सत्ता में आई, यादव व मुस्लिम समुदायों के कुछ दबंग तत्वों के भीतर यह धारणा घर कर गई कि अब शासन-प्रशासन पूरी तरह उनका है और तंत्र उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इस सामूहिक मनोविज्ञान ने उन्हें और अधिक आक्रामक बना दिया। उन्होंने कमजोर दलितों को दबाकर समाज के अन्य वर्गों को यह स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की कि अब सत्ता का नया केंद्र वे स्वयं हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि भूमि पर कब्जे, मजदूरी के विवाद और सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग को लेकर दलितों को निशाना बनाया जाने लगा। दलितों के आत्मसम्मान और उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता को कुचलने के लिए शारीरिक हिंसा, सामाजिक बहिष्कार और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। यह सत्ता के अहंकार का जमीन पर प्रदर्शन था, जहां एक वंचित वर्ग अपने बुनियादी मानवाधिकारों के लिए तड़प रहा था और दूसरा वर्ग उसे अपनी ताकत का अहसास करा रहा था।

दलितों पर लगातार अत्याचार

डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल का कहना है कि इस दौर के कुछ विशिष्ट घटनाक्रमों ने इस जातिगत उत्पीड़न और क्रूरता को राष्ट्रीय पटल पर ला खड़ा किया। साल 1995 का कुख्यात गेस्टहाउस कांड इसी राजनीतिक और सामाजिक दुश्मनी का चरम बिंदु था, जिसने यह साबित कर दिया कि सत्ता की भूख में लोकतांत्रिक मर्यादाओं और एक दलित महिला नेता के सम्मान को किस कदर तार-तार किया जा सकता है। यह घटना एक संदेश थी कि वे दलित समाज की आवाज को दबाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसी तरह बाद के वर्षों में बदायूं की घटना ने देश को हिलाकर रख दिया, जहां दो दलित बहनों के साथ हुई बर्बरता ने कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा के दावों की धज्जियां उड़ा दीं। इस तरह की घटनाएं पूरे प्रदेश में दिखाई पड़ीं। सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में दलित-मुस्लिम टकराव के बाद दलित बस्ती में आगजनी की घटना और उसके बाद सरकार का रुख मुस्लिम तुष्टीकरण का बड़ा उदाहरण था। प्रतापगढ़, जौनपुर, आजमगढ़, एटा, मैनपुरी जिलों में यादव-मुस्लिम दबंगों का दबदबा देखने को मिलता रहा। 2012 से 2017 के अखिलेश यादव के कार्यकाल को ‘नई सपा’ और ‘विकास की राजनीति’ के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन जमीनी हकीकत यह थी कि दलितों पर अत्याचार के मामले बदस्तूर जारी रहे।

यहां यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि दलितों पर अत्याचार के मामले लगभग हर सरकार में होते रहे हैं, फिर कठघरे में सपा की क्यों? यह इसलिए कि उसके कार्यकाल में इसे संगठित रूप से सत्ता के संरक्षण में किया गया। इस दल ने समाजवाद और सामाजिक न्याय का दावा किया था, लेकिन उसके शासनकाल में जातिवाद का उभार खतरनाक ढंग से हुआ। यह भी तथ्य है कि हर यादव या मुस्लिम व्यक्ति अत्याचारी नहीं था और हर दलित पीड़ित नहीं था। अपराध व्यक्तिगत भी होते हैं, लेकिन जब अपराधियों को निहित स्वार्थ के चलते राजनीतिक संरक्षण मिलता है तो बिना भेदभाव लोक-कल्याण की शपथ लेने वाली सरकार भी अपने संवैधानिक दायित्वों को भूलकर संकीर्ण वोटबैंक की राजनीति की बंधक बन जाती है।

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