ईदुल अजहा की नमाज सड़क पर न पढ़ने देने के सरकार के हुक्म की वजह से पुलिस प्रशासन और आम आदमी दोनों परेशान

कानपुर । आल इन्डिया कौमी मुशावरत कमेटी के अध्यक्ष व खानकाह हजरत दादा मियाँ रहमतुल्लाह अलैह के सज्जादा नशीन सैय्यद अबुल बरकात नजमी ने कहा कि मुसलमान साल में सिर्फ दो नमाजें ईदुल फित्र व ईदुल अजहा ईदगाह में अदा करता है। क्योंकि ईदैन की नमाज मस्जिद और घरों में अदा नहीं की जा सकती है।
इन नमाजों को अदा करने में महज आधा घंटा लगता है इस ईदगाह की नमाज के लिए पुलिस प्रशासन ईदगाह से मिली हुई सड़क पर नमाज अदा करवाती है। हमेशा की तरह आज भी ईदगाह से मिली हुई सड़क पर आवाजाही बंद रहती है।
लेकिन आज की सरकार का हुक्म है कि कोई भी मुसलमान सड़क पर नमाज अदा नहीं कर सकता बल्कि शिफ्ट में नमाज अदा करें यह हुकुम भी हम मुसलमानों ने मान लिया लेकिन उसके बाद भी सड़क की आवाजाही बंद क्यों रहती है?
इस हुकुम की वजह से पुलिस प्रशासन और आम आदमी दोनों परेशान होते हैं जो काम आधे घंटे में हो जाता था वही काम अब दो से ढाई घंटे में होता है। उन्होंने कहा कि ईदैन की नमाज मुसलमान जिस अदब और एहतराम के साथ एवं शांति और सद्भाव के साथ अदा करता है उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है।
हमारे हाथों में सिर्फ जाए-नमाज होती है ना लाठी डंडा और न डीजे और न नारे न शोरगुल बस दो रकात नमाज अदा की जाती है। और मुल्क के अमन की दुआ की और गले लगा कर एक दूसरे को मुबारकबाद दी और घर वापस आ गए।

सद्भावना के जो कैंप लगते थे तमाम पार्टियों के अब वह भी खत्म कर दिए गए हैं। भारत विविधताओं का देश है यहां अलग-अलग धर्म भाषाएं और संस्कृतियों मिलकर एक ऐसी सामाजिक तस्वीर बनाती है जिसकी मिसाल दुनिया में कम ही देखने को मिलती है।
आज जब हमारा देश सामाजिक चुनौतियों धार्मिक कट्टरता और सहिष्णुता की कमी के दौर से गुजर रहा है। ईदुल अजहा का त्योहार केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि इंसानियत त्याग और भाईचारे का महत्वपूर्ण संदेश बनकर सामने आता है। ईदुल अजहा को कुर्बानी की ईद भी कहा जाता है।
यह त्योहार पैगंबर हजरत इब्राहिम की उस महान भावना की याद दिलाता है जब उन्होंने ईश्वर के आदेश के प्रति अपनी सबसे प्रिय चीज कुर्बान करने की तैयारी दिखाइ इस घटना का मूल संदेश यह है कि इंसान अपने स्वार्य अहंकार और लालच को त्याग कर समाज और मानवता के लिए जीना सीखें।
ईदुल अजहा का असली संदेश केवल जानवर की कुर्बानी तक सीमित नहीं बल्कि अपने भीतर की बुराइयों घ्रणा, अहंकार, लालच और कट्टरता को त्यागने में है।
उलेमा ए इकराम से अपील
उन्होंने हर मस्जिद के ईमाम व खतीब से अपील की कि ईद की नमाज मस्जिद में नहीं पढ़ी जा सकती सिवाय बूढ़े और माजूर के, हर शख्स पर फर्ज है कि वह ईदगाह जाए लेकिन देखने में यह आया है कि मकामी ईदगाह में तय वक्त से पहले सुन्नते रसूल सल्ल. अलै. वसल्लम को पामाल करते हुये ईदगाह के वक्त से पहले अपनी-अपनी मस्जिदों में नमाज अदा करवा देते हैं और गुनाह के भागीदार बन जाते हैं। खुदा के वास्ते खुद भी इस चीज का एहतेमाम करें और अवाम को भी इस गुनाह से बचाएं। मुल्क में अमन के लिए जहां आप दुआएं फरमाते हैं उसी तरह से लेबनान और फलस्तीन की आवाम के लिए भी दुआएं जरूर करें ।