वो हर किसी को गले से लगाए रखता है, ​वफ़ा की राह में उसको थकावट नहीं होती

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मुसीबत पास आने से हमेशा ही कतराती है, जब सर पे माँ की दुआओं का साहबान होती है

राजीव कुमार कनौजिया

वो हर किसी को गले से लगाए रखता है।

​वफ़ा की राह में उसको थकावट नहीं होती,

थके हुए को वो मंज़िल दिखाए रखता है।

​न शोर-ओ-ग़ुल की तमन्ना, न सुर्ख़ियों का शौक़,

वो चुपके-चुपके ही बस्ती बसाए रखता है।

​किसी के ज़ख़्म पे मरहम, किसी की आँख में नूर,

वो अपनी ज़ात में कितने उपाय रखता है।

​हवाएँ लाख मुख़ालिफ़ हों पर वो शख़्स ‘राजीव’,

उम्मीदों का दिया फिर भी जलाए रखता है।

​ग़ज़ल : माँ की दुआ

​खुदा का रूप धरती पर, खुदा की शान होती है,

वही तो घर की बरकत है, वही तो जान होती है।

​मुसीबत पास आने से हमेशा ही कतराती है,

जब सर पे माँ की दुआओं का साहबान होती है।

​ज़माने भर की कड़वाहट को हँसकर पी ही लेती है,

ममता की मूरत वो बड़ी मेहरबान होती है।

​उसे पढ़ना नहीं आता, मगर वो सब समझती है,

हमारी अनकही बातों की वो ज़ुबान होती है।

​अँधेरों में भी रस्ता वो हमें दिखला ही देती है,

हज़ारों मुश्किलों का माँ ही एक समाधान होती है।

​जहाँ में ढूँढ लो ‘राजीव’ कहीं ऐसा सुकून नहीं,

माँ के क़दमों के नीचे ही तो जन्नत-ओ-अमान होती है।

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