2027 की चुनावी रणनीति बनाने में विपक्ष को इन तथ्यों को ध्यान में रखना होगा
लखनऊ। यूपी के पूर्व अपर परिवहन आयुक्त अशोक कुमार का कहना है कि जब हम दलित बहुजन राजनीति का परिदृश्य और आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं तो बेहद शर्मनाक एवं आश्चर्यजनक तथ्य सामने आते हैं। यूपी के विधानसभा चुनाव 2022 के परिणाम और दलित आबादी विशेषकर जाटव / चमार और पासी उप जातीय बहुलता वाले जिलों के अध्ययन से यह तथ्य सामने आता है कि जाटव/ चमार बाहुल्य विधानसभा क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी के सर्वाधिक एमएलए चुने गये हैं। उदाहरण के लिए आगरा में अनुसूचित जाति की संख्या 24 फ़ीसदी है जिसमें जाटव की जनसंख्या प्रदेश में सबसे अधिक 7 लाख है। भाजपा ने यहां कुल 9 की 9 सीटें जीतीं। इसकी मुख्य वजह यूपी में बहुजन आंदोलन का कमजोर होना है बहुजन आंदोलन को मजबूत किये बगैर विपक्ष के लिए भाजपा को शिकस्त देना मुश्किल होगा।

कानपुर देहात वर्तमान में दलित पैंथर के तथाकथित दलित सामाजिक आंदोलन का केंद्र है
उनका कहना है कि जाटव बाहुल्य अलीगढ़, हाथरस की सभी सीटेंं क्रमश: 7 व 3 भाजपा ने जीतीं। मजेदार बात यह है कि ये क्षेत्र शुरू से ही जागरुक अम्बेडकरवाद का क्षेत्र रहा है। इसी प्रकार कानपुर देहात की सभी 4 सीटें भाजपा को गईं जबकि यहां दलित आबादी 26 फ़ीसदी है। जिसमें सर्वाधिक चमार उप जाति के हैं। यह क्षेत्र भी लम्बे समय से ललई सिंह यादव व अर्जक संघ का कार्य क्षेत्र रहा है तथा वर्तमान में दलित पैंथर के तथाकथित दलित सामाजिक आंदोलन का केंद्र है।
आगरा व कानपुर देहात देहात में सबसे ज्यादा हो रहे दलितों पर अत्याचार
अशोक कुमार का कहना है कि दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जिन जिलों में दलित आंदोलन मुखर है, उन्हीं जिलों में सरकारी आंकड़ों एनसीआरबी के अनुसार सर्वाधिक दलित अत्याचार होते हैं । आगरा इन अत्याचारों में शीर्ष पर है। यही हाल गोरखपुर, हरदोई, लखीमपुर खीरी , बुलंदशहर, बांदा , चंदौली, झांसी, उन्नाव व सीतापुर का है जहां जाटव/ चमार बाहुल्य है किंतु यहां से लगभग सभी विधान सभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है और यही जिले दलित अत्याचार के केंद्र भी हैं। यहां पासी उप जाति बाहुल्य क्षेत्र कौशाम्बी ( सभी 3 सीट सपा) , लखनऊ, प्रतापगढ़, रायबरेली में भाजपा को अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। 2027 की चुनावी रणनीति बनाने में इन तथ्यों को ध्यान में रखना होगा।