प्रकृति का सम्मान ही मानवता का सम्मान है : राजीव कनौजिया

Share

हमने प्रकृति के साथ कहीं न कहीं बहुत बड़ा खिलवाड़ किया : प्रांतीय प्रवक्ता डीपीआरए

​ लखनऊ। डिप्लोमा फार्मासिस्ट राजपत्रित अधिकारी एसोसिएशन (डीपीआरए)  के प्रांतीय प्रवक्ता राजीव कुमार कनौजिया ने ​कहा कि आज इस पावन अवसर पर जब हम सब यहाँ एकत्रित हुए हैं, तो एक स्वास्थ्य पेशेवर और मुख्य फार्मासिस्ट होने के नाते, मेरा अंतर्मन इस विषय पर बहुत गहराई से विचार करने को व्याकुल है।

चिकित्सा जगत में हम रोज नई औषधियों और उन्नत तकनीकों की खोज कर रहे हैं, लेकिन जीवन की सबसे बुनियादी और पहली औषधि—शुद्ध वायु, स्वच्छ जल और हरी-भरी धरती—को हम पीछे छोड़ते जा रहे हैं।

आज चिकित्सालयों में बढ़ती हुई सांस की बीमारियाँ, अस्वस्थ जीवनशैली और नए-नए विकार इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि हमने प्रकृति के साथ कहीं न कहीं बहुत बड़ा खिलवाड़ किया है। इसी दर्द और वर्तमान हकीकत को बयां करते हुए कुछ शेर आपके समक्ष रखना चाहता हूँ:

​हवा में ज़हर है, पानी भी अब बीमार रहता है,

परिंदा पेड़ खोकर आज कल लाचार रहता है।

​धुएँ के बादलों ने छीन लीं मासूमियत सबकी, मरीज़ों से भरा अब शहर का बाज़ार रहता है।

स्वास्थ्य और प्रकृति का अटूट रिश्ता

​साथियों, प्रकृति की सुरक्षा ही वास्तव में मानव सभ्यता की सुरक्षा है। जब तक हमारी वसुंधरा अस्वस्थ रहेगी, तब तक कोई भी समाज पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं हो सकता। हम दवाओं से तात्कालिक राहत तो पा सकते हैं, लेकिन दीर्घकालिक आरोग्य हमें केवल और केवल प्रकृति की गोद में ही मिल सकता है।

​इस सत्य को रेखांकित करते हुए ग़ज़ल का यह रंग मुलाहिजा फरमाएं:

​जो नुस्खे ढूँढते हैं हम दवाओं की दुकानों में,

वो असली स्वास्थ्य तो पीपल की ठंडी धार रहता है।

​कटेंगे पेड़ तो फिर सांस लेना भी कशिश होगा,

मगर इंसान ही अपनी कुल्हाड़ी यार रखता है।

​यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस पेड़ से हमें जीवनदायिनी ऑक्सीजन मिलती है, उसी को काटने के लिए मनुष्य हमेशा तत्पर दिखाई देता है। विकास की अंधी दौड़ में हमने कंक्रीट के जंगल तो खड़े कर लिए, लेकिन उन हरे-भरे जंगलों को खो दिया जो हमारी असली जीवन-रेखा थे।

 हमारा सामूहिक संकल्प और उत्तरदायित्व

​आज विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक दिन का उत्सव या केवल भाषण देने का मंच नहीं होना चाहिए। यह दिन है आत्म-मंथन का, अपनी आदतों को बदलने का और ज़मीन पर ठोस कदम उठाने का। अगर हम आज सचेत नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियों को हम एक बहुत ही दुर्बल और बीमार भविष्य सौंप कर जाएंगे।

​इसलिए, मैं आप सभी से कुछ बुनियादी संकल्प लेने का आग्रह करता हूँ:

​एक पौधा, एक जीवन: अपने या अपने परिवार के हर विशेष अवसर पर कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएँ और केवल लगाएँ ही नहीं, बल्कि उसकी तब तक देखभाल करें जब तक वह एक आत्मनिर्भर वृक्ष न बन जाए।

​प्लास्टिक को कहें ना: सिंगल-यूज प्लास्टिक का उपयोग अपने दैनिक जीवन से पूरी तरह वर्जित करें। यह हमारी मिट्टी और जल दोनों को घुन की तरह खा रहा है।

​जल संरक्षण: पानी की हर एक बूँद को अमृत समझकर सहेजें। व्यर्थ बहता हुआ पानी कल के सूखे का निमंत्रण है।

​ग़ज़ल के इस अंतिम शेर के साथ मैं अपनी बात को विराम की ओर ले जाना चाहूँगा:

​चलो मिलकर यहाँ आज एक ऐसा संकल्प ले लें हम,

वही सच्चा मसीहा है जो शजर (पेड़) का प्यार रखता है।

​आइए, हम सब मिलकर एक स्वच्छ, हरित, समृद्ध और प्रदूषण-मुक्त भारत के निर्माण में अपनी आहुति दें। प्रकृति को बचाइए, प्रकृति हमें स्वयं बचा लेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *