जन गण मन अधिनायक, टैगोर और जॉर्ज पंचम

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जन गण मन अधिनायक जय हे  भारत भाग्य विधाता।

 

          शिवचरण चौहान

यह गीत बांग्ला कवि रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा था। जब 1911 में जॉर्ज पंचम और उनकी पत्नी क्वींस मैरी भारत आई थी तो उन्हीं के स्वागत में यह गीत रविंद्र नाथ टैगोर ने लिखा था। यद्यपि जॉर्ज पंचम के स्वागत में यह गीत गाया नहीं गया था। पर कांग्रेस ने अपने कोलकाता अधिवेशन 27 दिसंबर 1911में इसी गीत को गाया था । तब अमृत बाजार पत्रिका सहित कई अखबारों में यह खबर छपी थी। उन्हीं दिनों अंग्रेजों ने बंगाल विभाजन को रद्द कर दिया था और उड़ीसा को अलग राज्य बना दिया था महात्मा गांधी इसी से खुश थे। और जवाहरलाल नेहरू के दबाव में बाद में इसे भारत का राष्ट्रीय गान बनाया गया था जो आज तक सम्मान सहित गाया जा रहा है। कहते हैं कि इसी गीत के कारण रवीन्द्र नाथ टैगोर को अंग्रेजों ने नोबेल पुरस्कार दिलवाया था। इस गीत में कहा जाता है कि अधिनायक शब्द का प्रयोग जॉर्ज पंचम द्वितीय के लिए हुआ था। उस समय जॉर्ज पंचम ही भारत का अधिनायक यानी सम्राट था। उसी दिन रामभुज चौधरी द्वारा लिखित एक हिंदी गीत बादशाह हमारा –जो हिंदी में था जॉर्ज पंचम की प्रशंसा में गाया गया था। वैसे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कई प्रखर विद्वान यह मानते रहे हैं कि यह गीत भारत का राष्ट्र गान नहीं हो सकता इसीलिए बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के एक बंगला उपन्यास में आए गीत वंदे मातरम को राष्ट्रीय गान माना गया है।

सुजलाम सुफलाम शस्य श्याम लाम 
वंदे मातरम।।

सन 1917 में रवींद्र नाथ टैगोर ने इस गीत को धुन में बांधा था और गेय कर दिया था। तब रवीन्द्र नाथ टैगोर ने सफाई दी थी कि उन्होंने जन गण मन में अधिनायक शब्द भगवान के लिए प्रयोग किया है। भगवान ही भारत का भाग्य विधाता हो सकता है। जन गण मन अधिनायक राष्ट्रगान का मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया था और सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार केरल के मामले में कहा था कि अगर कोई इस गान के समय खड़ा नहीं होता तो यह राष्ट्रगान का अपमान नहीं है। दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि हर सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजाया जाए और सभी का खड़ा होना अनिवार्य होगा किंतु बाद में सुप्रीम कोर्ट ने ही अपना यह आदेश वापस ले लिया था।

जब कल्याण सिंह राजस्थान के राज्यपाल थे तो उन्होंने जन गण मन अधिनायक के अधिनायक शब्द पर सवाल पूछा था कि अधिनायक किसके लिए कहा गया है?
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने तो खुलेआम अधिनायक शब्द को जॉर्ज पंचम द्वितीय की स्तुति और चापलूसी कहा था। पूर्व न्यायाधीश मारकंडेय काटजू ने तो यहां तक प्रमाण दिया था किस प्रसिद्ध अखबार इंग्लिश मैन में रवींद्र नाथ टैगोर ने स्वीकार किया था कि यह गीत उन्होंने दबाव में लिखा था। किंतु आज भी हम यह गीत बड़े शान से गाते हैं।

पूर्व राज्यपाल कल्याण सिंह ने अधिनायक शब्द की जगह मंगल दायक शब्द को लेने के लिए कहा था। काग्रेस सफाई देती आई है कि गीत में अधिनायक शब्द भगवान के लिए आया है। अधिनायक ईश्वर को कहते हैं और इसी कारण पूरा देश आज भी सम्मान सहित जन गण मन अधिनायक जय हे ही गाता है। इसी गान को गाकर लाखों क्रांतिकारियों ने अपनी जान दे दी है। इसी के समानांतर आज भी वंदे मातरम गाया जाता है और लगता है कि यह गीत भारत मां की वंदना में लिखा गया है। इसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ से लिया गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडिया गेट पर महान क्रांतिकारी आजाद हिंद फौज के सेनापति सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा का अनावरण किया था। इसी के पास जॉर्ज पंचम द्वितीय की प्रतिमा लगी है। इसे अब हटा देना चाहिए। अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बना कर रखा था इसलिए अंग्रेजों की हर निशानी मिटा देनी चाहिए। इंडिया गेट का नाम भारत द्वार कर देना चाहिए। आखिर यह आजाद भारत के सम्मान का मामला है। रवीन्द्र नाथ टैगोर ने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहा था बदले में महात्मा गांधी ने र वींद्र नाथ टैगोर को गुरुदेव की उपाधि दी थी। नोबेल पुरस्कार मैग्सेसे पुरस्कार और अनेक सरकारों द्वारा दिए जाने वाले साहित्य ,गैर साहित्यिक पुरस्कार अधिकांश सरकार के चाटुकारों को ही दिए जाते हैं। यह तब भी होता था और आज भी हो रहा है।

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