मूलनिवासी बहुजन समाज के प्रेरणास्रोत हैं छत्रपति राजर्षि शाहू जी महाराज : देव प्रताप सिंह

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शाहू जी महाराज भारत के पहले ऐसे शासकों में थे जिन्होंने 26 जुलाई 1902 को अपने राज्य में पिछड़े और वंचित वर्गों के लिए प्रतिनिधित्व (आरक्षण) की व्यवस्था लागू की

लखनऊ। प्रबुद्ध भारत निर्माण संघ के संयोजक इंजीनियर देव प्रताप सिंह ने  मूलनिवासी बहुजन समाज के महान समाजसुधारक, दूरदर्शी शासक और सामाजिक न्याय के अग्रदूत राजर्षि छत्रपति शाहू जी महाराज की जयंती पर सभी साथियों को हार्दिक बधाई दी। शाहू जी महाराज  का जन्म आज ही के दिन 26 जून 1874 को हुआ था।

वे भारत के पहले ऐसे शासकों में थे जिन्होंने 26 जुलाई 1902 को अपने राज्य में पिछड़े और वंचित वर्गों के लिए प्रतिनिधित्व (आरक्षण) की व्यवस्था लागू की। यह कदम सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक भागीदारी की दिशा में ऐतिहासिक था।

इंजीनियर देव प्रताप सिंह ने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिराव फुले द्वारा प्रारंभ किए गए सामाजिक क्रांति के आंदोलन को उन्होंने आगे बढ़ाया और डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे महान विचारक एवं संघर्षशील नेतृत्व को हरसंभव सहयोग दिया। शाहू जी महाराज स्वयं मुंबई जाकर डॉ. आंबेडकर से मिले, उनकी शिक्षा और सामाजिक मिशन को आर्थिक एवं नैतिक समर्थन दिया। इसीलिए उन्हें आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय की परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। जातिवाद का अंत आवश्यक है।” 15 अप्रैल 1920 को नासिक में उदोजी विद्यार्थी छात्रावास की आधारशिला रखते हुए शाहू जी महाराज ने कहा था:  “जातिवाद का अंत ज़रूरी है। जाति को समर्थन देना अपराध है। हमारे समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा जाति है।”यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना एक शताब्दी पहले था।

सामाजिक प्रतिबद्धता

जब उन्हें सामाजिक सुधारों के कारण जान से मारने की धमकियाँ मिलीं, तब उन्होंने कहा:
“मैं गद्दी छोड़ सकता हूँ, लेकिन सामाजिक न्याय और मानवता के कार्यों से पीछे नहीं हट सकता।”
लोकतंत्र और सामाजिक न्याय
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने शाहू जी महाराज के योगदान का सम्मान करते हुए कहा:
> “राजर्षि शाहू महाराज सामाजिक लोकतंत्र के सच्चे समर्थक थे।”
शाहू जी महाराज ने यह सिद्ध किया कि सत्ता का उद्देश्य विशेषाधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि वंचितों को अधिकार दिलाना है।
शाहू जी महाराज के प्रेरक विचार पर नजर घुमाएं तो आज के संविधान की झलक उनके विचारों में मिलती है।

1. “सामाजिक और आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है”

(संविधान भाग 4 नीति निदेशक तत्व अनुच्छेद 36 से अनुच्छेद 51)
2.”शिक्षा ही समाज के उत्थान का सबसे प्रभावी साधन है।”
(अनुच्छेद 21 , अनुच्छेद 45 अनुच्छेद 29 और 30)
3.”राज्य का पहला कर्तव्य है कि वह कमजोर और वंचित वर्गों को न्याय और अवसर प्रदान करे।”
(भाग 4 नीति निदेशक तत्व )
समग्र रूप से इनको तीन बिंदुओं में समझा जा सकता है।

1. मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) पर शाहू जी महाराज के विचार

“हर मनुष्य को जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी योग्यता और मानवता के आधार पर समान सम्मान और अवसर मिलने चाहिए।”
* जाति-आधारित भेदभाव का विरोध।
* शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में समान अवसर का समर्थन।
* अस्पृश्यता और सामाजिक बहिष्कार के विरुद्ध सक्रिय कदम।
* वंचित वर्गों के सम्मान और गरिमा की रक्षा पर बल।
सार: “समानता, स्वतंत्रता और मानव गरिमा ही न्यायपूर्ण समाज की नींव हैं।”

2. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व (Directive Principles) पर शाहू जी महाराज के विचार समझिए जो बाद में मूल अधिकारों में भी शामिल किए गए 

“राज्य का पहला कर्तव्य है कि वह कमजोर, गरीब और वंचित वर्गों के उत्थान के लिए कार्य करे।”

* निःशुल्क और सुलभ शिक्षा का विस्तार।
(पहले इसका प्रावधान भाग 4 और अनुच्छेद 45 में था जिसे संविधान संशोधन के जरिए मूलाधिकार बनाया गया।

* छात्रावास, छात्रवृत्ति और सामाजिक कल्याण योजनाएँ।
(इसकी प्रेरणा संविधान के भाग चार और अनुच्छेद 38,39,41 43 43(a) अनुच्छेद 45, और अनु 47 में है।

* पिछड़े वर्गों के लिए प्रतिनिधित्व (1902 का आरक्षण)।
(इसका प्रेरणा भाग चार में और भाग 3 के अनुच्छेद 16,भाग 16 अनु 338(b ) और अनु 340 में शामिल है।)

* श्रमिकों, किसानों और वंचित समुदायों के हितों की रक्षा।
(अनु 43,43(b) अनु 48 और 48(b)

सार: “कल्याणकारी राज्य वही है जो अंतिम व्यक्ति तक न्याय और अवसर पहुँचाए।”

3. आर्थिक लोकतंत्र (Economic Democracy) पर शाहू जी महाराज के विचार को संविधान के नजरिए से देखें

नीति निदेशक तत्व अनु 38 विशेषकर अनुच्छेद 39 में इसकी संपूर्ण झलक मिलती है।
“राजनीतिक अधिकार तब तक सार्थक नहीं, जब तक समाज के प्रत्येक व्यक्ति को आर्थिक अवसर और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध न हो।”
* किसानों और श्रमिकों के हितों की रक्षा।
* शिक्षा को आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम मानना।
* संसाधनों और अवसरों तक समान पहुँच पर बल।
* सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक न्याय को जोड़ना।
सार: “आर्थिक समानता के बिना लोकतंत्र अधूरा है।”

देव प्रताप सिंह का कहना है कि डॉ. बी.आर. आंबेडकर के पूरक दृष्टिकोण को समझने की आवश्यकता है तभी आप शाहू जी महाराज को भी समझ पाएंगे। “राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिकाऊ नहीं हो सकता, जब तक उसके आधार में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र न हो।” “समानता केवल कानून में नहीं, जीवन की वास्तविक परिस्थितियों में भी दिखाई देनी चाहिए।”

राजर्षि शाहू जी महाराज का जीवन इस सिद्धांत का उदाहरण है कि राज्य की शक्ति का उपयोग सामाजिक न्याय, समान अवसर, शिक्षा, प्रतिनिधित्व और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए होना चाहिए। यही आदर्श आगे चलकर भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों, राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों और सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र की भावना में व्यापक रूप से परिलक्षित होते हैं।

आज जब लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक न्याय की चर्चा होती है, तब शाहू जी महाराज और बाबा साहब का जीवन हमें याद दिलाता है कि #समान_अवसर, शिक्षा, प्रतिनिधित्व और मानवीय गरिमा ही एक सशक्त राष्ट्र की नींव हैं। आइए, हम सभी फुले–शाहू–आंबेडकर की समतामूलक, वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक विचारधारा से प्रेरणा लेकर जाति-मुक्त, न्यायपूर्ण, बंधुत्वपूर्ण और संवैधानिक भारत के निर्माण का संकल्प लें।

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