नागा सेना ने अहमद शाह अब्दाली को नाको चने चबवा दिए

शिवचरण चौहान
अहमदाबाद में साबरमती नदी में वहां के एक ब्राह्मण परिवार को एक बालक पानी में बहता हुआ मिला था। ब्राम्हण लोदीराम ने उस बच्चे को नदी से निकाल कर पाल लिया। यही बालक आगे चल कर संत कवि दादूदयाल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दादू दयाल के नाम से दादू पंथ चला और नागा सेना बनी। नागा सेना ने विधर्मियों से देश की रक्षा के लिए तीस युद्ध लडे और जीते। कहते हैं सिख गुरू भी नागा सेना की सहायता लिया करते थे। कहते हैं सन 1544 में अहमदाबाद में साबरमती नदी में वहां के एक ब्राह्मण बुद्धि राम को एक बच्चा मिला था। साबरमती से बहते हुए बच्चे को निकाल कर लोधी राम ने अपने घर में उसे पाला पोषा। कहते हैं 11 साल की अवस्था में इस बालक को एक दिन एक वृद्ध के रूप में भगवान मिले और उन्होंने बालक दादू को ज्ञान के उपदेश दिए। या भगवान और कोई नहीं कबीर साहब थे जो वृद्ध का रूप बनाकर आए थे। कहते हैं बालक दादू ने कबीर को अपना गुरु मान लिया और संत बन कर घर से निकल गए किंतु इनके माता-पिता इन्हें समझा कर वापस ले आए और उनका विवाह कर दिया। विवाह के 7 साल बाद बालक दादू बिना कुछ बताए घर से निकल गया और अहमदाबाद से आबू पुष्कर होता हुआ सांभर पधारा। सांभर राजस्थान में दादू दयाल ने तपस्या की और उन्हें सिद्धि प्राप्त हुई। कहती तो यह भी हैं कि संत दादू दयाल के कारण ही मुगल सरकार ने गौ हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया था। फतेहपुर सीकरी में दादू दयाल ने 40 दिन तक सत्संग किया था। कहते हैं दादू दयाल ने रूई धुनने का भी काम किया था। वह साधारण कपड़े पहनते थे और गृहस्थ आश्रम में रहते थे और कबीर की तरह निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। उन्होंने जात पात छोडक़र सर्व धर्म समभाव का संदेश दिया। कबीर की तरह चेताया भी और समझाया भी। लगता है दादू दयाल पढ़े-लिखे नहीं थे। उनके शिष्यों ने उनकी वाणी दोहे और साखी का संग्रह किया है जो दादू वाणी नाम से प्रकाशित है। दादू के 52 पट शिष्य थे। शिष्यों में गरीबदास सुंदरदास, रज्जब, संत दास, जगन दास, जन गोपाल आज प्रसिद्ध हैं। रज्जब ने दादू दयाल के 5000 दोहों का संग्रह किया है जो अंग वधू के नाम से प्रकाशित मिलता है।
राजस्थान की अनेक स्थानों पर दादू दयाल रहे हैं और उन्होंने सत्संग कर हिंदू मुसलमान दोनों भक्तों को सही राह दिखला ई है। दादू दयाल बहुत दयालु थे इसी कारण वह दादू दयाल के नाम से प्रसिद्ध हुए। सब पर कृपा करना उनका स्वभाव था। उनका आशीर्वाद भक्तों पर फलीभूत होता था इसलिए हिंदू और मुसलमान दोनों भक्त उनके पास दौड़े चले आते थे। कहते हैं सन 1573 में सांभर में दादू दयाल ने दादू पंथ की स्थापना की थी। इस बंद का उद्देश्य सबकी भलाई था किसी धर्म का विरोध नहीं। आज दादू पंथ के 5 पंत हो गए हैं। खालसा, विरक्त तपस्वी, उतरार्थ, खाकी और अलख दरीबा। अलख दरीबा वह स्थान है जहां पर दादू दयाल का सत्संग होता है। कहते तो हैं दादू दयाल के 2 पुत्र और दो पुत्रियां थीं। संत गरीबदास को उनका पुत्र बताया जाता है किंतु यह बात प्रमाणित नहीं होती। जिस समय दादू दयाल का जन्म हुआ उस समय विदेशी आक्रांता भारत पर आक्रमण कर रहे थे और अपनी सल्तनत स्थापित कर चुके थे। हिंदुओं पर बहुत अत्याचार किए जा रहे थे। इसी कारण संत दादू दयाल ने युवा साधुओं की एक सेना बनाई जिसका नाम नागा सेना रखा गया। नागा सेना को आस्त शस्त्र का प्रशिक्षण दिया गया।
दादू दयाल की नागा सेना ने हिंदुओं की रक्षा के लिए 30 युद्ध लड़े और सभी में विजय प्राप्त की। सिख गुरु भी नागा सेना की मदद लिया करते थे। गुरु गोविंद सिंह ने भी नागा सेना की मदद ली थी और विजई हुए थे। जयपुर नरेश ने भी नागा सेना की मदद ली थी। मंगलदास एक नागा सेनापति थे जिन्होंने हिंदू धर्म और हिंदुओं की रक्षा हेतु अपना बलिदान दिया था। उस युद्ध में 700 नागा सैनिक मारे गए थे। दादू दयाल की एक पीठ रामगंज जयपुर में भी स्थापित है। ना रैना गांव में खेजड़ी के पेड़ के नीचे दादू दयाल ने कई दिन तप किया था। यहां पर दादू द्वारा बना हुआ है। यहां फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को हर साल मेला लगता है। भारत के अनेक स्थानों में दादू द्वारा बने हुए हैं। जहां पर दादू पीठ स्थापित है। दादू दयाल का जन्म कब हुआ इस को लेकर अनेक विवाद है किंतु संत कवि दादू दयाल संत 1603 में ब्रह्मलीन हुए थे इसको लेकर कोई विवाद नहीं है। ब्रह्मलीन होने से पहले संत दादू दयाल ने अपने शिष्यों को कुछ मार्गदर्शन किया था जिसके अनुसार उनकी समाधि बनाई गई। दादू दयाल की बनाई गई नागा सेना बहुत दिनों तक कायम रही किंतु जयपुर नरेश ने अंग्रेजों के दबाव में आकर नागा सेना को मदद देना बंद कर दिया और नागा सेना को भंग कर दिया। अभी अलख दरीबा में सत्संग होते हैं और हजारों भक्त आते हैं। कबीर के बाद दादू दयाल ऐसे संत हैं जिनका आम जनमानस में बहुत सम्मान है। दादू दयाल की वाणी कबीर की वाणी है। कबीर यह दादू दयाल के ईश्वर हैं और गुरु हैं।
दादू दयाल कहते हैं
जिन मोकू निज नाम दिया, सोहे सदगुरु हमार।
दादू दूसरा कोई नहीं, कबीर सिरजन हार।।
दादू नाम कबीर का जो कोई लेवे ओट।
उनको कबहू लागी नहीं काल वज्र की चोट।।
रोम रोम रस पीजिए,ऐसी रसना होय।
दादू प्याला प्रेम का, यो बिन तृप्ति न होय।।
आप चिरावे देहड़ा जिसवा करई जतन।
र्प तख परमेश्वर किया, सो भाने जीव रतन।।
यह मसीत यह देहरा, सदगुरु दिया दिखाई।
भीतर सेवा बंदगी, बाहर काहे जाई।।
तेजपुंज की सुंदरी, तेज पुंज का कंत।
तेज पुंज की सेज पर, दादू बन्या बसंत।।
हिंदू तुरक न होइबा, साहिब से ती काम।
खड संग ना जाइबा,निर पख कहिबा राम।।
ना हम हिन्दू होइंगे, ना हम मुसलमान।
खड़ दरशन में हम नहीं, हम राते रहमान।।
काला मुंह कर कर द का, दिल से दू रि निवार।
सब सूरत सब हान की, मुल्ला मुग्ध न मार।।
दादू दयाल के 5000 से अधिक दोहे मिलते हैं। पद और साखियां मिलती हैं। हिंदू और मुसलमान के पाखंड का विरोध किया गया है। सच्चा ईश्वर भक्त तो वह है जो सिर्फ इंसान को पहचानता है हिंदू मुसलमान को नहीं। राजस्थान के नाराणा में दादू दयाल के जन्म दिवस और ब्रह्मलीन होने के दिन पर मेला लगता है जहां दुनियाभर के उनके भक्त आते हैं। दादू की दादू अनुभव वाणी आज जी प्रासंगिक है और मशहूर है।