मायावती बात करतीं हैं शाहू, फुले और अंबेडकर के विचारधारा की, और साथ देतीं हैं मनुवादियों का : उदितराज

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नई उभरती पार्टी तो कुछ कर सकती है, लेकिन बसपा  जो एक बार गिर चुकी है और जिसका एक भी सांसद नहीं है, उसे जीतना नहीं है, सिवाय वोट काटने के

लखनऊ। दलित, ओबीसी, माइनारिटीज, आदिवासी परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद डॉ. उदितराज ने कहा कि 23 जून को अकबरपुर से बीएसपी की आई आवाज़ “ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी लखनऊ जाएगा”। उप्र में 1993 से 2017 तक की राजनीति में SP और BSP के अलावा, कांग्रेस और बीजेपी कहीं भी मुक़ाबले में नहीं थीं। 2014 में लोकसभा में बीजेपी की बड़ी जीत हुई और समीकरण बीजेपी के पक्ष में जाने लगे। BSP ने 5 जून 2005 को उत्तर प्रदेश में अपनी विचारधारा से हटकर पहला बड़ा ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित किया। वास्तविकता यह थी कि वहाँ कुछ ही ब्राह्मण थे, बाकी दलितों को ब्राह्मणों का पहनावा देकर खड़ा कर दिया गया था। SP के विकल्प में न कांग्रेस थी और न ही बीजेपी, तो ऐसे में ब्राह्मणों को BSP का समर्थन करना ही था हालाँकि प्रचार ज़्यादा था, मगर वोट बहुत कम मिले।

काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती। अंबेडकरनगर (अकबरपुर) में 23 जून को आयोजित BSP की रैली में ब्राह्मण समाज के लोगों ने मंच पर शंख बजाकर आगामी 2027 विधानसभा चुनावों के लिए शंखनाद किया। इस रैली के दौरान “ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी लखनऊ जाएगा” के नारों के साथ दलित-ब्राह्मण गठजोड़ को मजबूत करने का संदेश दिया गया। मायावती जी ब्राह्मणों के साथ गठजोड़ करें, किसी को क्या एतराज़? हाँ, एतराज़ है। वोट बहुजन का, और लाभ ब्राह्मणों को। विचारधारा साहू, फुले और अंबेडकर की, और साथ मनुवादियों को।

बीजेपी को पता है कि कांग्रेस और SP दोनों के मुक़ाबले में जीत पाना मुश्किल है, इसलिए BSP के द्वारा दलितों और ब्राह्मणों के वोटों को कांग्रेस और SP में जाने से रोकने के लिए ऐसा षड्यंत्र किया गया है। नई उभरती पार्टी तो कुछ कर सकती है, लेकिन BSP, जो एक बार गिर चुकी है और जिसका एक भी सांसद नहीं है, उसे जीतना नहीं है, सिवाय वोट काटने के। अकबरपुर के सम्मेलन में ब्राह्मण कह रहे हैं कि BSP में सम्मान मिलता है, इसलिए जॉइन कर रहे हैं। 2007 में जब BSP की सरकार बनी, तब सबसे ज़्यादा ब्राह्मणों का भला हुआ। सतीश मिश्रा, नवीन सहगल, शेखर सिंह, रामवीर उपाध्याय और सवर्ण अधिकारी ही ताक़तवर थे, न कि दलित नेता और अधिकारी। दलितों को नीचे बैठाया गया और उनसे भी टिकट के लिए पैसे लिए गए।

कितने दलितों को ठेकेदार, पत्रकार, खिलाड़ी या उच्च श्रेणी के स्कूल-कॉलेज बनाए गए? अधिकतर लाभ ब्राह्मणों ने लिया था, और जैसे ही उन्हें BJP का विकल्प मिला, वे BSP को छोड़ गए और अभी RSS/BJP के साथ हैं। इस बार भी वोट BJP को ही देंगे। जो बहुजन अभी भी BSP को हितैषी समझते हैं, वो सुधर जाएँ। अगर ब्राह्मणों में नेता नहीं है, तो मायावती जी को ही अपनी जाति का नेता बना देना चाहिए, या फिर उन्हें अपनी जाति में शामिल कर लेना चाहिए। पूर्वजन्म से कोई नाता ढूँढ़ लें। संविधान और आरक्षण बचाने की बात करें, तो लेटरल एंट्री से बिना आरक्षण के नियुक्तियाँ बन रही थीं, पर BSP ने कोई विरोध-प्रदर्शन या सम्मेलन नहीं किया। संविधान और आरक्षण ख़तरे में हैं, लेकिन कोई आंदोलन नहीं किया।इसकी लड़ाई राहुल गांधी जी ही देश स्तर पर लड़ रहे हैं ।

अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार में लगभग 11 लाख संविदा/ठेके के कर्मचारियों के संबंध में दिए गए फैसलों का सवाल है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लगातार वर्षों तक सेवा देने वाले कर्मचारियों का शोषण नहीं किया जा सकता। यूपी सरकार ने इसमें लीपापोती कर दी। BSP ने इसे लागू करने के लिए आंदोलन किया होता, तो करीब 60% बहुजनों को नौकरी मिली होती और ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’ करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वास्तव में, BSP को ऐसा करने का निर्देश दिया गया है ताकि जो ब्राह्मण वोट बीजेपी से नाराज़ होकर कांग्रेस को जाता था, वो अब BSP को मिले। इनका मकसद SP-कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकना है। अगर BSP लखनऊ पहुँचती भी है (जो कि कल्पना ही है), फिर भी, बिना दिल्ली पहुँचे संविधान और लोकतंत्र नहीं बचेगा।

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