लालू के सीएम बनने के पहले दलितों के गांव के गांव को घेर कर जला दिया जाता था
लखनऊ। दलित, ओबीसी, माइनारिटीज, आदिवासी परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद डॉ. उदितराज ने कहा कि सवर्ण समाज और मीडिया का जितना साथ नीतीश कुमार को मिला शायद भारत के किसी ओबीसी नेता को मिला हो। लालू यादव के सीएम बनने के पहले प्राय: सवर्ण ही बिहार के सीएम हुआ करते थे। दलित-पिछड़ों की आवाज बनकर लालू यादव उभरे और यह मनुवादी मानसिकता वालों को कहां बर्दास्त होना था? चूंकि दलित-पिछड़ा जाग गया था तो ऐसे में ओबीसी से आने वाले नीतीश कुमार को सीएम बनाकर काम चलाना शुरू कर दिया। उदितराज ने कहा कि लालू यादव के समय अराजकता जरूर थी लेकिन जो दलितों का नरसंहार भूमिहार और राजपूत करते थे उसका अंत हुआ। लालू यादव के सीएम बनने के पहले दलितों के गांव के गांव को घेर कर जला दिया जाता था। गोदी मीडिया उसको जंगल राज तो कभी नहीं कहा । उस समय इनके लिए कम्युनिट और मावोवादी लड़ते थे लेकिन लालू यादव के समय सरकार का साथ मिला और नरसंघार बंद हो गया।

लालू ने बिहार में सामाजिक न्याय की व्यवस्था को मजबूत किया
उन्होंने कहा कि माना कि लालू यादव के समय सडक़, बिजली और $कानून व्यवस्था खऱाब थी लेकिन दूसरा पहलू जबरदस्त था और वो था सामाजिक न्याय। सामाजिक न्याय से ज़्यादा कोई और बड़ा कार्य देश हित में हो ही नहीं सकता। जब सत्ता में लालू यादव नहीं रहे तो $गलतियों में सुधार किया तभी रेल मुनाफे में आई। जब-जब चुनाव आया सवर्ण मीडिया जंगलराज का तगमा लगाती रही और इसलिए आरजेडी दुबारा सत्ता में नहीं आई। अगर दुबारा आती है ओ पूर्व की गलतियों को सुधार करती और सामाजिक न्याय का कारवां आगे बढ़ता। कुछ महीनों में तेजस्वी यादव लगभग पांच लाख सरकारी नौकरी देने में कामयाब रहे और इसी से पता लगता है अतीत से सीखा था।
नीतीश ने दलितों और पिछड़ों में बहुत ही होशियारी से बंटवारा कर दिया

नीतीश कुमार एक चालाक और व्यावहारिक नेता हैं। इन्होंने दलित और पिछड़ों में बंटवारा बड़ी होशियारी से कर दिया । स्वाभाविक है एक जाति को दूसरे के मु$काबले में खड़ा करना आसान ही नहीं बल्कि टिकाऊ होता है। जाति का नेता कुछ दे या न लेकिन मनोवैज्ञानिक रूप से लोग संतुष्ट रहते हैं। भौतिकता से कहीं ज़्यादा भावना प्रभावित करती है । उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार 20 साल तक सरकार चलाये और सही दृष्टिकोण और वैज्ञानिक सोच होती तो शून्य से शुरू करके बिहार को बीमारू राज्य के श्रेणी से मुक्त करा देते। इतने दिनों तक वे सत्ता में रहे कौन सा चमत्कार कर दिया। आरजेडी एक मजबूत और स्थाई विकल्प के कारण बीजेपी की मजबूरी रही कि नीतीश कुमार को ढाल की तरह इस्तेमाल करती रहे और जब कमजोर कर दिया तो कैसे दबाव बनाकर सीएम पद से हटा दिया।
राहुल गांधी के अलावा कोई दूसरा नेता निजीकरण का विरोध नहीं कर रहा

पूर्व सांसद डॉ. उदितराज ने कहा जिन अति पिछड़ों और महादलितों के समर्थन से नीतीश नेता बने रहे उन्हें क्या मिला? इनका उत्थान अच्छी शिक्षा, आरक्षण और विभिन्न क्षेत्रों में भागीदारी से होना था न कि सुशासन के नैरेटिव से। सवर्ण मीडिया नीतीश कुमार की गलती छुपाती रही और आरजेडी का हमेशा डर दिखाती रही।लालू यादव की सामाजिक न्याय की पूंजी कभी ख़त्म न होगी लेकिन नीतीश का कौन सा काम है जो बहुजनों के उद्धार के लिए जाना जाएगा। 2014 से बीजेपी केंद्र सरकार में है और लगातार निजीकरण कर नौकरी ख़त्म करती जा रही है। राहुल गांधी के अलावा कोई नहीं उठाता। करीब 90 हज़ार सरकारी स्कूल बंद हो गए क्या कभी इस पर नीतीश कुमार ने आवाज उठाई ? गिरती और महंगी शिक्षा का प्रतिकूल असर बिहार के अति पिछड़ा वर्ग पर कहीं ज़्यादा पड़ा। इन सवालों को कभी नीतीश कुमार ने संबोधित नहीं किया। जातीय जनगणना एक बड़ा काम हुआ था लेकिन उस पर अमल न हो सका। दलित रसोइयों के हाथ से बने भोजन को सवर्ण बच्चे खाने से इंकार कर देते हैं। उन्होंने यूपी की घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि प्रदेश के जनपद सीतापुर में 2018 की एक रिपोर्ट में सामने आया कि एक स्कूल में 76 में से केवल 6 बच्चों ने मिड-डे मील खाया, क्योंकि खाना एक दलित रसोइया ने बनाया था। कानपुर देहात के एक प्राइमरी स्कूल में वहां की प्रधानाध्यक दलित रसोइया से शौचालय साफ करा रही थी। क्या ऐसे मामलों में किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई।