रोटी कमल चर्बी और 1857,  स्वतंत्रता संग्राम के कुछ दबे हुए पृष्ठ : देव कबीर

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” भारत की कुछ दुर्दांत जातियां जिनमें अहीर दुसाध तथा डोम बहुत लड़ाके थे, यह हमेशा ही अंग्रेजों का कानून मानने से इनकार करते थे

 लेखक  शोधकर्ता एवं संपादक – देव कबीर (कानपुर)

स्वतंत्रता संग्राम के कुछ दबे हुए पृष्ठ में लेखक देव कबीर ने लिखा है कि हालांकि अब जब 2026 में मेरी यह पुस्तक “रोटी कमल चर्बी और 1857″ प्रकाशित होने जा रही है तब मेरा भी बहुत चीजों को लेकर के भ्रम साफ हो चुका है। यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि आखिर इन बड़े-बड़े लेखकों ने उस खलासी को मातादीन नाम किस आधार पर दे दिया। ऐसा कोई पुख्ता प्रमाण मैं ढूंढ नहीं पाया हूं। यह जरूर है कि अंग्रेजी फौज में खलासी के पद पर अछूतों की ही भर्ती होती थी क्योंकि यह बहुत ही नीचा काम माना जाता था। क्योंकि कारतूस में सूअर और गाय की चर्बी मिलाई जाती थी इसलिए इस काम में उन्हें जातियों को रखा जा सकता था जिन्हें सूअर और गाय को खाने में किसी तरह का परहेज न रहता हो। इस आधार पर तो उस खलासी को अछूत मेहतर भंगी पासी या चमार माना जा सकता है।

दूसरी एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात जो मैं कहना चाहता हूं जो मुझसे पहले किसी इतिहासकार या लेखक ने नहीं कही वह यह कि स्वतंत्रता संग्राम से पहले ही क्रांति का माहौल बनाने के लिए जिन प्रतीकों रोटी और कमल का प्रयोग किया गया उसमें गांव-गांव रोटी पहुंचाने की जिम्मेदारी गांव के चौकीदारों को दी गई तथा अंग्रेजी पलटनों में सिपाहियों तक कमल ले जाने की जिम्मेदारी पीरों फकीरों और साधुओं को दी गई।

गांव-गांव रोटी पहुंचाने वाले यह चौकीदार अछूत और पिछड़ी जाति की ही होते थे सबसे अधिक अछूत ही,खासकर डोम, दुसाध,खंगार, मेहतर ही इस पद पर रखे जाते थे। आज भी गांव में जो चौकीदार तैनात है उनकी जाति का आंकड़ा देखा जा सकता है।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी इस संबंध में लिखते हैं कि-  ” भारत की कुछ दुर्दांत जातियां जिनमें अहीर दुसाध तथा डोम बहुत लड़ाके थे। यह हमेशा ही अंग्रेजों का कानून मानने से इनकार करते थे। उनके लड़ाके चरित्र को देखते हुए अंग्रेजों ने इन्हें चौकीदार के रूप में भर्ती कर वश में कर लिया

इन अछूत चौकीदारों के द्वारा ही एक गांव से दूसरे गांव में रोटी पहुंचाने का महत्वपूर्ण काम लिया गया। जिस चौकीदार के पास रोटी पहुंचती थी उसमें से वह कुछ रोटी खा लेता था बाकी गांव में बंटवा देता था और फिर उसी तरह की पांच रोटियां बनवा कर अगले गांव तक पहुंचा देता था। यह इस बात का सबूत था की क्रांति जल्द ही होने वाली है और हम सब उसके समर्थन में हैं।

यहां यह कहा जा सकता है कि छुआछूत भेदभाव जाति पाति का हर समय पालन करने वाले भारतीय मुसीबत के समय जात-पात भूल कर एक हो सकते हैं। यह इस इस तरह भी कहा जा सकता है कि मतलब के लिए सवर्ण जन जिन अछूतों की परछाई से भी नफरत करते हैं मुसीबत के समय उनका जूठा खाने पीने को तैयार हो जाते हैं। यह कल भी था और आज भी है। चौकीदारों की तरह ही क्रांति की चिंगारी को गांव-गांव घरों घरों तक पहुंचने में अछूत जाति की दाईयों,डोमनियों( गायिकाओं), तवायफों, घरेलू नौकरानियों,वैदू महिलाओं (वैद्य गिरी का परंपरागत रूप से काम करने वाली अछूत आदिवासी जाति की महिलाएं )बैंड बाजा बजाने वाले अछूतों का भी बहुत बड़ा योगदान था। हजारों कहानियां इस संबंध में किताबों में अंग्रेजों की डायरियों में सरकारी रिपोर्ट्स में भरी पड़ी हैं।

जहां एक ओर अछूतों पिछड़ों ने भारत से अंग्रेजी राज को खत्म करने का काम किया वहीं दूसरी ओर कानपुर में बनी स्वीपर पुलिस, धोबी पलटन,बुंदेलखंड में बनी डुमार बसोर सेना, महाराष्ट्र में बनी महार बटालियन आदि ने ब्राह्मण रेजीमेंट, राजपूत रेजीमेंट ,डोगरा रेजीमेंट,मेव बटालियन, सिख इन्फेंट्री आदि की तरह अंग्रेजी हुकूमत को कायम रखने में भी अपना योगदान दिया ,कुर्बानी दी। विपदा के समय अंग्रेजी परिवारों को बचाने सुरक्षित निकालने तथा आश्रय देने में जहां नवाब जमींदार और राजाओं ने लालच वश सहयोग किया वहीं अछूतों पिछड़ों, आम जन ने दया और करुणा के चलते अंग्रेज परिवारों की सहायता की।

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