शादी होते ही महिलाओं का नाम, मालिक, पता, मित्र, रहन-सहन और अधिकार सब बदल जाते हैं
श्रीनगर । कश्मीर के चिंतन शिविर में डोमा के अध्यक्ष, डॉ. उदित राज ने कहा कि हिंदू समाज में महिलाओं का कुछ भी नहीं है। शादी होते ही उसका नाम, मालिक, पता, मित्र, रहन-सहन और अधिकार सब बदल जाते हैं। जब तक यह स्थिति रहेगी, सैकड़ों वर्षों तक इन्हें समान भागीदारी और अधिकार नहीं मिल पाएंगे। सवर्णों ने जाति को बनाए रखने के लिए महिलाओं पर विधवा प्रथा लागू की, ताकि वे दूसरी जाति में शादी न कर सकें।
डॉ. उदित राज ने कहा कि बाल विवाह भी इसलिए प्रचलित रहा ताकि वे बड़े होकर दूसरी जाति में शादी न कर लें। सती प्रथा इसलिए थी कि पति के मरने के बाद वे किसी और के साथ जीवन न बिताएं, जिससे जाति व्यवस्था टूटे नहीं। विवाह से पहले उनकी पहचान पिता से होती है और शादी के बाद पति से। आखिर ये कितनी इंसान हैं—आधा, एक-चौथाई या उससे भी कम? जो पुरुष सामाजिक न्याय की बात अपने लिए करते हैं, वे अपनी लड़कियों और महिलाओं को कितना अधिकार और आज़ादी देते हैं?
उन्हें भी इस पर सोचना होगा। श्रीनगर के टैगोर हॉल में जब डॉ. उदित राज ने प्रशिक्षण शिविर में यह बात कही, तो महिलाओं ने इसकी बहुत सराहना की। ऐसे संदेश को महिला साथियों को न केवल वायरल करना चाहिए, बल्कि उस पर विचार भी करना चाहिए और स्वयं में परिवर्तन लाने का प्रयास करना चाहिए। कश्मीर में फिर से ऐसा शिविर आयोजित करने के बारे में लोगों के विचार आने लगे हैं और जैसे ही नाम आने लगेंगे, योजना बनाई जा सकती है। जो लोग डोमा के इस विचार से जुड़ना चाहते हैं, वे संपर्क करें। इनकी आज़ादी की लड़ाई कोई और नहीं लड़ सकता, सिवाय इनके।
