संसाधनों और संस्थाओं पर क्रमिक रूप से एक वर्ग द्वारा किया जा रहा है कब्जा : देव प्रताप सिंह

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डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिकाऊ नहीं हो सकता, जब तक उसके आधार में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र न हो”

आजाद समाज पार्टी कांशीराम के प्रदेश प्रवक्ता देव प्रताप सिंह का कहना है कि भारत दुनिया का सबसे युवा देश कहा जाता है। देश की लगभग 65 करोड़ आबादी युवा वर्ग में आती है। लेकिन इसी भारत में बेरोजगारी, अवसरों की असमानता और राजनीतिक व आर्थिक केंद्रीकरण लगातार गंभीर प्रश्न बनते जा रहे हैं।

संसाधनों और संस्थाओं पर क्रमिक रूप से एक वर्ग द्वारा कब्जा किया जा रहा है और लोकतंत्र की भूमि पर महत्वपूर्ण प्रश्न नदारद हैं। लोकसभा में 543 सांसद हैं, राज्यसभा में 245 सदस्य हैं और देशभर की विधानसभाओं में 4000 से अधिक विधायक बैठे हैं।

केंद्र और राज्यों को मिलाकर सैकड़ों मंत्री, राजनीतिक सलाहकार, आयोगों और निगमों के पदाधिकारी तथा दलों के संगठनात्मक पदों से जुड़ा एक विशाल सत्ता तंत्र मौजूद है। यदि इनसे जुड़े प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों को जोड़कर देखें तो सत्ता के आसपास लगभग 15 हजार परिवारों का प्रभाव दिखाई देता है।

युवा बेरोजगारी दर वास्तविक 12% से ऊपर रही भले इसे सरकारी आंकड़े कुछ दिखाये जायें

दूसरी तरफ देश का सामान्य युवा है—जो प्रतियोगी परीक्षाओं, बेरोजगारी, महंगाई और असुरक्षित भविष्य के बीच संघर्ष कर रहा है और मानसिक तनाव झेल रहा है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार कई अवधियों में युवा बेरोजगारी दर वास्तविक रु 12% से ऊपर रही भले इसे सरकारी आंकड़े कुछ दिखाये जायें । रेलवे भर्ती 2019 में 1 करोड़ 26 लाख युवाओं ने आवेदन किया था। उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती में 60 लाख से अधिक आवेदन आए।

NEET परीक्षा में हर वर्ष 20 लाख से अधिक छात्र बैठते हैं। Pcs SSC, बैंक, रेलवे, सेना और शिक्षक भर्ती में करोड़ों युवा वर्षों तक लाइन में खड़े रहते हैं। देव प्रताप सिंह का कहना है कि यह केवल रोजगार का संकट नहीं है; यह अवसरों की असमानता का संकट भी है। राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्यप्रदेश सहित अनेक राज्यों के लाखों युवा किराए के छोटे कमरों में रहकर तैयारी करते हैं।

एक साधारण परिवार प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर प्रतिवर्ष 1 से 5 लाख रुपये तक खर्च कर देता है। बच्चों की शिक्षा के खातिर कई परिवार खेत बेचते हैं, कर्ज लेते हैं या गहने गिरवी रखते हैं।

गरीब युवा जनरल डिब्बों में सफर करके परीक्षा केंद्रों तक पहुंचता है, जबकि विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लिए संसाधन और संपर्क जन्म से उपलब्ध रहते हैं

इसके विपरीत देश के प्रभावशाली राजनीतिक और आर्थिक परिवारों के बच्चों की जीवन-स्थितियां बिल्कुल अलग दिखाई देती हैं। वे विदेशों की महंगी यूनिवर्सिटियों में शिक्षा प्राप्त करते हैं, जहां वार्षिक फीस 25 लाख से 1 करोड़ रुपये तक पहुंचती है। गरीब युवा जनरल डिब्बों में सफर करके परीक्षा केंद्रों तक पहुंचता है, जबकि विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लिए संसाधन और संपर्क जन्म से उपलब्ध रहते हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्टों के अनुसार संसद में 80% से अधिक सांसद करोड़पति हैं। अनेक सांसदों और विधायकों की घोषित संपत्ति दर्जनों और सैकड़ों करोड़ रुपये में है। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत समृद्धि का मामला नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की प्रतिनिधिक प्रकृति पर भी प्रश्न उठाती है।

डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में चेतावनी दी थी कि भारत राजनीतिक समानता और सामाजिक-आर्थिक असमानता के विरोधाभास में प्रवेश कर रहा है। आज यह विरोधाभास और स्पष्ट दिखाई देता है। वोट सबके पास बराबर है, लेकिन अवसर बराबर नहीं हैं। अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने विकास को केवल GDP वृद्धि नहीं, बल्कि “मानवीय क्षमताओं के विस्तार” के रूप में परिभाषित किया था। यदि करोड़ों युवा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से वंचित हैं, तो आर्थिक विकास अधूरा माना जाएगा।

युवाओं के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि वे राजनीति को केवल पहचान की लड़ाई के रूप में देखेंगे या नीतियों और जवाबदेही के आधार पर परखेंगे

देश में लाखों सरकारी पद खाली पड़े हैं, लेकिन भर्ती प्रक्रियाएं वर्षों तक लंबित रहती हैं। पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने और न्यायिक विवादों के कारण युवाओं का समय और ऊर्जा दोनों नष्ट होते हैं। इसके बावजूद सार्वजनिक बहस का बड़ा हिस्सा रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के बजाय धार्मिक व सांप्रदायिक मुद्दों पर केंद्रित रहता है। जब बेरोजगारी की बात होती है तो बहस का विषय बदल जाता है। जब महंगाई पर सवाल उठते हैं तो भावनात्मक मुद्दे सामने आ जाते हैं। इससे लोकतंत्र में वास्तविक आर्थिक प्रश्न पीछे छूट जाते हैं।

युवाओं के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि वे राजनीति को केवल पहचान की लड़ाई के रूप में देखेंगे या नीतियों और जवाबदेही के आधार पर परखेंगे। जिस दिन युवा नेता की जाति और धर्म से आगे बढ़कर उसकी नीतियों, संपत्ति, पारिवारिक हितों, शिक्षा, रोजगार और शासन पर सवाल पूछना शुरू करेगा, उसी दिन लोकतंत्र अधिक उत्तरदायी बनने लगेगा। लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं है। लोकतंत्र वह व्यवस्था है जिसमें एक साधारण किसान या मजदूर का बच्चा भी उतने ही अवसरों के साथ आगे बढ़ सके, जितने किसी प्रभावशाली राजनीतिक परिवार के उत्तराधिकारी को सहज रूप से उपलब्ध होते हैं।

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