सिर्फ 10% प्रतिनिधित्व : भारत के लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी

( प्रो. (डॉ.) इस्मत जहाँ रिज़वी, स्वास्थ्य विशेषज्ञ)
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां विविधता, समावेश और समानता की बात बार-बार दोहराई जाती है। लेकिन जब हम राजनीतिक प्रतिनिधित्व के आंकड़ों पर नजर डालते हैं, तो एक चिंताजनक सच्चाई सामने आती है—महिलाओं की भागीदारी आज भी बेहद कम है। हाल ही में Association for Democratic Reforms (ADR) द्वारा जारी आंकड़े इस असमानता को स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं। ADR के अनुसार, देशभर में कुल 4,666 सांसदों और विधायकों में से केवल 464 महिलाएं हैं, जो लगभग 10 प्रतिशत ही है। यह आंकड़ा बताता है कि देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व राजनीतिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में कितना सीमित है। 18वीं Lok Sabha में भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है, जहां 543 में से केवल 74 महिलाएं हैं, यानी कुल का लगभग 14 प्रतिशत। यह स्थिति केवल संसद तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में भी महिलाओं की भागीदारी चिंताजनक रूप से कम है। 2024 के लोकसभा चुनावों में केवल 9.6 प्रतिशत उम्मीदवार महिलाएं थीं। इतना ही नहीं, लगभग 28 प्रतिशत निर्वाचन क्षेत्रों में एक भी महिला उम्मीदवार मैदान में नहीं थी। यह आंकड़े यह संकेत देते हैं कि समस्या केवल प्रतिनिधित्व की नहीं है, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था में गहराई तक जमी असमानताओं की है।
लोकतंत्र की मजबूती के लिए महिलाओं की समान उपस्थिति अनिवार्य
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति कई कारणों से उत्पन्न होती है। सामाजिक संरचना, पारंपरिक सोच, आर्थिक निर्भरता और राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं—ये सभी मिलकर महिलाओं के लिए राजनीति में प्रवेश को कठिन बनाते हैं। आज भी कई क्षेत्रों में महिलाओं को घर और परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित समझा जाता है, जिससे उनका सार्वजनिक जीवन में आना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। हालांकि, यह भी सच है कि समय के साथ कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। 1957 के चुनावों में जहां केवल 45 महिला उम्मीदवार थीं, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर लगभग 800 तक पहुंच गई है। यह वृद्धि दर्शाती है कि महिलाओं में राजनीति के प्रति रुचि और भागीदारी बढ़ रही है। लेकिन यह वृद्धि अभी भी उनकी जनसंख्या के अनुपात में बहुत कम है। भारत की राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने भी कई अवसरों पर इस बात पर जोर दिया है कि देश के समग्र विकास के लिए महिलाओं की समान भागीदारी अनिवार्य है। उनका मानना है कि जब तक महिलाओं को हर क्षेत्र में, विशेषकर नीति-निर्माण में, बराबरी का अवसर नहीं मिलेगा, तब तक सच्चे अर्थों में विकास संभव नहीं है।
महिलाओं की कम भागीदारी का प्रभाव केवल संख्या तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह नीतियों और निर्णयों पर भी असर डालता है। जब निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाओं की संख्या कम होती है, तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों—जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और रोजगार—पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा पाता। इसके विपरीत, जहां महिलाओं की भागीदारी अधिक होती है, वहां सामाजिक विकास के संकेतक बेहतर देखने को मिलते हैं।
राजनीतिक दलों की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। अधिकांश दल चुनावों में महिलाओं को टिकट देने में हिचकिचाते हैं। कई बार महिलाओं को केवल प्रतीकात्मक रूप से टिकट दिया जाता है या ऐसे क्षेत्रों में उतारा जाता है जहां जीत की संभावना कम होती है। यह प्रवृत्ति भी महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व का एक बड़ा कारण है। इसके अलावा, चुनाव लड़ने की प्रक्रिया भी महिलाओं के लिए चुनौतीपूर्ण होती है। चुनावी खर्च, संसाधनों की कमी और राजनीतिक नेटवर्क का अभाव—ये सभी बाधाएं महिलाओं को पीछे धकेलती हैं। कई बार सामाजिक और पारिवारिक दबाव भी उन्हें राजनीति में आगे बढ़ने से रोकता है। हालांकि, इन चुनौतियों के बावजूद, देश में कई ऐसी महिलाएं हैं जिन्होंने इन बाधाओं को पार कर राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। इनकी सफलता यह दर्शाती है कि यदि अवसर और समर्थन मिले, तो महिलाएं किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकती हैं।
महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर प्रयास करने होंगे। सबसे पहले, राजनीतिक दलों को महिलाओं को अधिक टिकट देने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। इसके अलावा, महिलाओं के लिए प्रशिक्षण और नेतृत्व विकास कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए, ताकि वे राजनीति में प्रभावी भूमिका निभा सकें। शिक्षा और जागरूकता भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब समाज में महिलाओं की शिक्षा और आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, तब वे अधिक आत्मविश्वास के साथ राजनीति में कदम रख सकेंगी। साथ ही, मीडिया और सामाजिक संगठनों को भी महिलाओं के मुद्दों को प्रमुखता से उठाना होगा। महिला आरक्षण विधेयक जैसे कदम भी इस दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यदि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक निश्चित प्रतिशत सीटें आरक्षित की जाती हैं, तो इससे उनकी भागीदारी में तेजी से वृद्धि हो सकती है। हालांकि, केवल आरक्षण ही पर्याप्त नहीं है—इसके साथ-साथ सामाजिक सोच में बदलाव भी जरूरी है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में यह आवश्यक है कि नेतृत्व समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करे। जब तक महिलाओं को समान अवसर और प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा।
आज समय की मांग है कि हम इस मुद्दे को गंभीरता से लें और ठोस कदम उठाएं। महिलाओं को राजनीति में आने के लिए प्रोत्साहित करना, उनके लिए अनुकूल माहौल तैयार करना और उन्हें नेतृत्व के अवसर देना—ये सभी कदम देश के उज्जवल भविष्य के लिए आवश्यक हैं। अंततः, यह समझना जरूरी है कि महिलाओं का सशक्तिकरण केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे समाज के विकास का आधार है। जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं, तो परिवार, समाज और देश सभी प्रगति करते हैं। भारत के लोकतंत्र को मजबूत और समावेशी बनाने के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि महिलाओं की भागीदारी को केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्यता के रूप में देखा जाए। क्योंकि जब महिलाएं आगे बढ़ेंगी, तभी भारत सही मायनों में आगे बढ़ेगा।