कांशीराम जी बार-बार भाजपा के साथ गठबंधन करने के पक्ष में नहीं थे
कमल जयंत
बसपा प्रमुख मायावती जी के करीबी रहे पूर्व आईएएस रोहित नंदन का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने 1995 में जब पहली बार बिना किसी शर्त के बसपा को समर्थन देकर मायावती के नेतृत्व में यूपी की सरकार बनवायी, तभी से यह लगने लगा था कि भाजपा का मकसद बहुजन आंदोलन का उभार नहीं बल्कि इस आंदोलन को खत्म करना है। हालांकि भाजपा को अपना इस लक्ष्य को पाने में लगभग बाइस साल लगे, लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने दो समान विचारधारा वाले दलों सपा और बसपा को अलग करने में सफलता हासिल कर ली। बहुजन नायक कांशीराम जी इस गठबंधन को लंबा चलाये जाने या बार-बार दोहराये जाने के पक्ष में नहीं थे। बावजूद इसके भाजपा के सहयोग से बसपा ने यूपी में मायावती जी के नेतृत्व में तीन बार सरकार बनायी।

निर्वाचन आयोग तो भाजपा के विंग के तौर पर काम कर रहा है
रोहित नंदन का कहना है कि भाजपा के सहयोग से बसपा की यूपी में सरकार तो बनी, लेकिन इससे बहुजन आंदोलन कमजोर हुआ। क्योंकि बसपा जिन सांप्रदायिक और जातिवादी ताकतों के खिलाफ आंदोलन शुरू करने के लिए वजूद में आई, बाद में उन्हीं ताकतों के साथ सत्ता की खातिर समझौता कर लिया। जिसकी वजह से बसपा का मूवमेंट कुंद पडऩे लगा और आज पार्टी यूपी में सबसे कमजोर स्थिति में है जबकि यहां पार्टी का सबसे मजबूत जनाधार हुआ करता था। उन्होंने कहा कि मायावती जी के बयानों से तो साफ है कि वह अकेले चुनाव लड़ेंगी, लेकिन यूपी में कांग्रेस-सपा का गठबंधन यानि कि इंडिया गठबंधन काफी मजबूत होकर उभर रहा है। दो साल पहले हुए लोकसभा चुनाव में इस गठबंधन ने यूपी में भाजपा को भारी शिकस्त दी। जिसकी वजह से भाजपा केन्द्र में अपने बूते सरकार नहीं बना सकी और उसे दो बैशाखियों का सहारा लेना पड़ रहा है। हां विपक्ष की मुश्किलें कम नहीं हैं। यूपी में निर्वाचन आयोग ने साढ़े तीन करोड़ वोट काट दिये हैं। निर्वाचन आयोग तो भाजपा के विंग के तौर पर काम कर रहा है। बदले हुए सियासी परिवेश में विपक्ष इसकी भरपाई कैसे करेगा, इस पर भी काफी निर्भर करेगा।

भाजपा 80 फीसदी हिन्दू बनाम 20 फीसदी मुस्लिम के बीच लड़ाई दिखाकर बहुमत को अपने पक्ष में लाने में कामयाब हो रही है
कभी बसपा अपने फार्मूले 85-15 यानि दलित, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक बनाम 15 फीसदी सवर्ण के बीच लड़ाई का परशेप्सन तैयार करके भाजपा के हिन्दुत्व के खिलाफ मजबूत लड़ाई लड़ती थी, लेकिन अब भाजपा 80-20 करने में सफल हो रही है। यानि 80 फीसदी हिन्दू बनाम 20 फीसदी मुस्लिम के बीच लड़ाई दिखाकर बहुमत को अपने पक्ष में लाने में कामयाब हो रही है। फिलहाल भाजपा के कट्टर हिन्दुत्व के आगे विपक्ष का साफ्ट हिन्दुत्व सफल होता नहीं दिख रहा है। उनका कहना है कि दरअसल बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने हिन्दूवादी व्यवस्था से पीडि़तों के लिए एक नयी राह खोजी और उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। बसपा भी बाबा साहब की विचारधाराओं को मानती है और उन्हीं विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए कांशीराम जी ने इस पार्टी का गठन किया, लेकिन पार्टी को बुद्धिज्म से अलग रखा।

अखिलेश-मायावती का गठबंधन बना रहता तो बहुजन आंदोलन मजबूत होता
उनका कहना है कि मायावती जी व्यक्तिगत तौर पर बौद्ध धर्म को मानती हैं। उनके सारे आयोजन भी बौद्ध रीति से होते हैं, लेकिन उन्होंने हिन्दुत्व के मुकाबले बुद्धिज्म को कभी बढ़ावा नहीं दिया। अगर वे बौद्ध धर्म को बढ़ावा देंती तो जो दलित आज काफी मात्रा में हिन्दू ही नहीं बल्कि कट्टर हिन्दू हो रहा है। वह भाजपा और हिन्दुत्व के बहकावे में न आता। ऐसी स्थिति में बसपा भाजपा के हिन्दुत्व के एजेंडे को कमजोर कर सकती थी। रोहित नंदन का मानना है कि सपा और बसपा तेल और पानी की तरह हैं। तेल और पानी कभी साथ नहीं रह सकते। हालांकि इस गठबंधन का फायदा तो बसपा को ही हुआ। इस गठबंधन से दोनों दलों को सियासी सफलता जरूर नहीं मिली, लेकिन ये गठबंधन बरकरार रहता तो बहुजन मूवमेंट मजबूत होता और आज की तारीख में भाजपा को शिकस्त देने की स्थिति में होता।