सुप्रीम कोर्ट किसका है और किसके लिए काम करता है जानना मुश्किल नहीं : उदितराज

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यूजीसी नियम पर अभी लगी रहेगी रोक

लखनऊ। दलित, ओबीसी, माइनारिटीज, आदिवासी परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद डॉ. उदितराज ने कहा कि 19 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी नियम पर सुनवाई होनी थी, लेकिन तारीख आगे बढ़ गई और तब तक इस पर रोक लगी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट किसका है और किसके लिए काम करता है जानना मुश्किल नहीं है। यह भी कहा जा रहा है कि ज़्यादा नंबर लाने पर एससी/एसटी/ओबीसी के छात्र ईर्ष्या वश झूठे मामलों में सवर्णों को फंसा देंगे।

तर्क दिए जा रहे इस नियम के लागू होने से सामान्य वर्ग के छात्र आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाएंगे

उन्होंने कहा कि यूं ही फेसबुक पर रील्स देखते समय नजर पड़ी तो देखा कि दर्जनों पोस्ट घृणा, झूठ और भेदभाव से भरी हुई थीं। सबसे मज़ेदार तर्क यह था कि इससे समाज में न$फरत और बंटवारा होगा। इतनी नफरत भरी पोस्ट देखकर लगा कि देश क्यों गुलाम रहा? गुलाम बनाने वालों का उतना दोष नहीं नज़र आता। ऐसे तर्क दिए जा रहे हैं कि इस नियम के लागू होने से सामान्य वर्ग के छात्र आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाएंगे, पढ़ाई छोड़ देंगे और लड़कियों को समझौता करना पड़ेगा। यह भी कहा जा रहा है कि ज़्यादा नंबर लाने पर एससी/एसटी/ओबीसी के छात्र ईर्ष्यावश झूठे मामलों में फंसा देंगे।

 

उच्च न्यायपालिका, कॉर्पोरेट हाउस और उच्च नौकरशाही में 90  फीसद सामान्य वर्ग का ही वर्चस्व

उदितराज ने कहा कि देखा जाए तो यूजीसी नियम की जांच समिति में ऐसा कुछ नहीं है। आइए जानते हैं कि सच्चाई क्या है। जांच समिति में 3 सीनियर प्रोफेसर/फैकल्टी मेंबर, 1 कर्मचारी, 2 समाज प्रतिनिधि और 2 विशेष आमंत्रित छात्र सदस्य शामिल होंगे, जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी, दिव्यांगजन और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है। ऐसा बवंडर खड़ा कर दिया गया है मानो जांच समिति में केवल एससी,एसटी,ओबीसी ही होंगे और तुरंत सामान्य वर्ग के छात्रों को फांसी पर चढ़ा देंगे। उनका कहना है कि मीडिया हाउस, उच्च न्यायपालिका, कॉर्पोरेट हाउस और उच्च नौकरशाही में 90  फीसद  सामान्य वर्ग का ही वर्चस्व है। जब तक यह रहेगा, तब तक समाज में बिखराव नहीं होगा, लेकिन जैसे ही एससी, एसटी व ओबीसी की भागीदारी होती है, यह कहा जाने लगता है कि इससे समाज का बंटवारा हो रहा है। उन्होंने कहा कि जातीय नफरत से अधिक दुनिया में कोई हलाहल विष न होगा। इसका एक चौथाई ताकत पेपर लीक, निजीकरण के कारण नौकरियों का ख़ात्मा और महँगी शिक्षा के विरोध में लगाया होता तो कितनों का भला हो गया होता। आखिर सवर्णों को दलित, पिछड़े और आदिवासी समाज से इतनी नफ़रत क्यों है।

यूजीसी नियम को बचाना है तो जनशक्ति का प्रदर्शन ही एकमात्र रास्ता

यूजीसी नियम के विरोध में दर्जनों रील्स देखीं, जबकि पक्ष में केवल एक-दो ही दिखीं। शोषित और गुलाम समाज की आदत होती है कि वह मालिक के हुक्म से चलता है। हुक्मरान की बात जल्दी समझ में आ जाती है, लेकिन जब खुद कुछ करने की बात आती है तो लोग इधर-उधर देखने लगते हैं और अपनों में से ही आगे बढऩे वालों के खिलाफ खड़े हो जाते हैं। आपस में नेतृत्व को लेकर झगड़ा शुरू हो जाता है। अंदर की दबी भावनाएँ जाग जाती हैं और लोग एक-दूसरे की टांग खींचने में ही अपनी ताकत लगा देते हैं। ऐसे में लगता नहीं कि यूजीसी नियम बच पाएगा। अगर इसे बचाना है, तो जनशक्ति का प्रदर्शन ही एकमात्र रास्ता है।

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