अत्याचारियों के विरोध में सुल्ताना डाकू ने बुलंद की आवाज

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सेठों और सामंतों ने सुल्ताना को डाकू कहा (जन्म-4.1.1884)

             नवल किशोर

जनता के लिए तो वह गरीबों का प्यारा सुलतान था

द्वेष की धूल तले दबे बहुजन नायक जैसे सुल्ताना डाकू, गुंडा धुर, गंगू तेली, गुरु घंटाल में से प्रस्तुत है किस्सा सुल्ताना का…सुल्ताना डाकू उर्फ गरीबों का प्यारा इतिहास का सच है परन्तु उससे सम्बंधित अनेक मिथक फिल्मों, नौटंकियों और लोकगीतों में है। कल्पना की धुंध में सुल्ताना का वास्तविक जीवन लिपट गया है। अंग्रेजों, सेठों और सामंतों ने उसे डाकू कहा। जनता के लिए तो वह गरीबों का प्यारा सुलतान था। सुल्ताना नाम तो उसे हिकारत से देखने वालों ने उसे दिया। सुल्ताना पर शोध करने वाले सीमैप के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. एनसी शाह ने उसे मजबूत इरादे और उच्च चरित्र का इंसान कहा है। सुल्ताना डाकू का जन्म उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जनपद के सटे गांव हरथला में खानाबदोश जाति भातू में हुआ था। उसका ननिहाल काठ में था। किंतु अंग्रेजों ने भातुओं को काठ से नवादा में बसा दिया था। सुल्ताना का बचपन नवादा में गुजरा।  

जीते-जी किवदंती बन गया था सुल्ताना

कहा जाता है कि वह अमीरों को लूटता था और गरीबों में बांटता था। यह समाजवाद का उसका ब्रांड था। सभी जानते हैं कि वह हत्यारा नहीं था। उसने कहा भी है कि उसने कभी किसी की हत्या नहीं की। बावजूद इसके उसे एक मुखिया की हत्या के जुर्म में फांसी हुई। उसकी गिरफ्तारी के लिए ब्रिटिश सरकार ने फ्रेड्रिक यंग के नेतृत्व में विशेष दल बनाया था। उस विशेष दल में प्रसिद्ध शिकारी जिम कार्बेट भी शामिल थे। जिम कार्बेट आयरिश मूल के भारतीय लेखक एवं दार्शनिक थे। वे नैनीताल के पास कालाढूंगी में रहते थे।

जिम कार्बेट ने अपनी पुस्तक ‘माई इंडिया’’ में ‘सुल्ताना : इंडियन रॉबिनहुड’’ नाम के अध्याय में उसकी जमकर प्रशंसा की है। इससे सुल्ताना के व्यक्तित्व को समझा जा सकता है। क्या यह महत्वपूर्ण नहीं कि सुल्ताना की गिरफ्तारी में मदद करने वाले जिम कार्बेट ने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की? सुल्ताना डाकू को गिरफ्तार करने की टीम में जिम कॉर्बेट भी थे।जिम कार्बेट ने ’ माई इंडिया ’ नाम की किताब लिखी। इसमें एक अध्याय सुल्ताना पर है।

सुल्ताना : इंडियाज रॉबिनहुड में जिम कार्बेट ने लिखा कि वह बड़े बनियों को लूटता था, मगर छोटे दुकानदारों को वह सामान खरीदने पर दुगुनी राशि देता था। आश्चर्य कि यह बात खुद उसको गिरफ्तार करने वालों में से एक जिम कार्बेट ने लिखी है। जिम कार्बेट ने लिखा कि सुल्ताना ने गरीबों को कभी नहीं सताया। किसी गरीब को कभी नहीं लूटा। गरीबों से उसे हमदर्दी थी। एक बार बरगद के एक पेड़ के नीचे मिला था। जाने क्यों, सब जानते हुए उसने मुझे और मेरे साथियों को बख्श दिया। वाकई सुल्ताना जमींदारों के षड्यंत्र का शिकार हुआ था। इसी षडयंत्र से वह पकड़ा गया और फाँसी भी हो गई।जमींदारों से वह इतना खफा था कि अपने कुत्ते का नाम उसने राय बहादुर रख लिया था।

इतना ही नहीं, जिस पुलिस पदाधिकारी फ्रेड्रिक यंग ने उसकी गिरफ्तारी की थी, उसी ने सुल्ताना के पुत्र और पत्नी को पुराने भोपाल में बेलवाड़ी के पास बसाया, बेटे को अपना नाम दिया और लंदन में पढ़ाकर आईसीएस अधिकारी बनाया। डॉ. एन. सी. शाह ने लिखा है कि जंगलों में सुल्ताना ने दो बार यंग और जिम कार्बेट की जिंदगी बख्शी थी। इससे डाकू सुल्ताना का उज्ज्वल चरित्र उजागर होता है। आखिरकार 14 दिसंबर, 1923 को सुल्ताना अपने खास साथी पीतांबर, नरसिंह, बलदेवा और भूरे के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। सुल्ताना पर नैनीताल की अदालत में ‘नैनीताल गन केस’ के नाम से मुकदमा चला और आगरा जेल में फाँसी दे दी गई। गांधी ने मूलत: अंग्रेज शोषकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी …. फुले ने मूलत: भारतीय शोषकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी….. लेकिन सुल्ताना ने एक साथ अंग्रेज और भारतीय दोनों शोषकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी।

सुल्ताना स्त्रियों के साथ दुव्र्यवहार और छेडख़ानी के सख्त खिलाफ था-जिम कार्बेट ने अपनी पुस्तक में एक वाकया का वर्णन किया है कि एक बार उसके गैंग के सदस्य पहलवान ने स्त्री लूट लाई थी। सुल्ताना ने उस स्त्री को बाइज्ज़त घर पहुंचाने का फौरन फरमान जारी किया। जिम कार्बेट की पुस्तक ’ माई इंडिया ’ सुल्ताना के बारे में जानने के लिए महत्वपूर्ण समकालीन स्रोत है। ’ माई इंडिया ’ में लिखा है कि सुल्ताना ने पूरे डकैती जीवन में कभी भी किसी गरीब आदमी की एक कौड़ी भी नहीं लूटी। यह भी लिखा है कि वह दुखियारों को मदद करने से कभी इनकार नहीं किया और छोटे दुकानदारों से जब सामान लेता था, तब दुगुना मूल्य देता था। जिम कार्बेट ने ’ माई इंडिया ’ में और फिलिप मेसन ने ’ दि मेन हू रूल्ड इंडिया ’ में लिखा है कि सुल्ताना अमीरों को लूटता था और गरीबों में बाँट देता था।यह प्रकार से उसका सामाजिक न्याय करने का तरीका था।

तब कुमाऊं के पुलिस कमिश्नर पर्सी बिंडहम थे। सुल्ताना से हैरान-परेशान बिंडहम ने अपने समय के तेज तर्रार पुलिस आफिसर फ्रेडी यंग की माँग ब्रिटिश सरकार से की।फ्रेडी यंग ने सुल्ताना की गिरफ्तारी के लिए 300 सिपाहियों और 50 घुड़सवारों की फौज लगाई। चप्पे-चप्पे पर खुफिया तैनात किए गए। तब जाकर 14 दिसंबर, 1923 को सुल्ताना की गिरफ्तारी हो सकी। फ्रेडी यंग ने सुल्ताना को पकडऩे में जिम कार्बेट की मदद ली थी। जिम कार्बेट बाघ और चीता मारने का शिकारी और जंगल का अनुभवी था।

लेकिन सुल्ताना दरियादिल इंसान था। अपनी गिरफ्तारी से पहले पुलिस आफिसर को छोड़ दिया था। जिम कार्बेट ने लिखा है कि बरगद के एक पेड़ के पास सुल्ताना मिला था और उसने मेरी और मेरे साथियों की जान बख्श दी थी। यही कारण था कि फ्रेडी यंग और जिम कार्बेट सुल्ताना की फांसी नहीं चाहते थे। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत और जमींदार डरे हुए थे तथा वे आखिरकार बगैर सुल्ताना का पक्ष जाने जल्दबाजी में फाँसी दिलवा डाले। और इस प्रकार गरीबों के मसीहा सुल्ताना का अंत हो गया।

सुलताना डाकू के जीवन और कार्यों को काव्य – नाटक में बाँधने का श्रेय नथाराम शर्मा गौड़ और मु. अकील पेंटर को है । नथाराम शर्मा हाथरस के रहने वाले थे और उनकी पुस्तक का नाम है – ‘’ सुल्ताना डाकू उर्फ गरीबों का प्यारा ‘’। अकील पेंटर ग्राम चांदन ( लखनऊ ) के थे और उनकी पुस्तक का नाम है -’ शेर – ए – बिजनौर : सुल्ताना डाकू ’। अकील पेंटर ने अपना जीवन – परिचय कुछ यों दिया है –
वालिद रफीक मास्टर , अकील मेरा नाम ।
जिला मेरा लखनऊ है , चांदन मेरा ग्राम । ।

उत्तर प्रदेश और बिहार के कस्बों , मुफस्सल और गांवों में शायद ही ऐसा कोई नाटक हो , जिसकी लोकप्रियता इतनी मिली हो, जितना कि नथाराम शर्मा और अकील पेंटर के नाटकों को मिली। अकील पेंटर ने लिखा है-
जिला एक बिजनौर है, जहां शहर नजीबाबाद ।
उसी शहर का दोस्तों , यह है सच्चा संवाद ।।
है सच्चा संवाद वहीं का, सुनिए यार फसाना ।
बड़ा बहादुर बबर शेर ,एक था डाकू सुल्ताना
वहीं नथाराम शर्मा ने लिखा है-
जिला एक बिजनौर है , यू.पी. के दरम्यान।
शहर नजीबाबाद को , लो उसमें ही जान ।।
था उसका ये काम,अमीरों का बस लूट खजाना।
बेकस और गरीबों को आराम सदा पहुंचाना ।।
आश्चर्य कि काव्य-प्रतिभा और जनप्रिय होने के बावजूद दोनों नाटककार आज भी कहीं गुम हैं।

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