मैं व्यवस्था का विधाता और सत्ता का केंद्र हूं , लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूं
लखनऊ। सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नये नियमों पर 19 मार्च तक रोक लगा दी है। बावजूद इसके यूजीसी के नये नियमों का समर्थन और विरोध जारी है। सवर्ण समाज यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन के इस नये नियम को अपने खिलाफ अत्याचार और उत्पीडऩ मान रहा है, वहीं दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के लोग इस नये नियम को अपनी सुरक्षा के तौर पर देख रहे हैं। यूजीसी के नये नियम लागू किये जाने की बात सामने आते ही कवि डॉ. कुमार विश्वास ने सवर्णों की बेचारगी दिखाते हुए एक कविता पोस्ट की जो सोशल मीडिया पर काफी वायरल है।
‘चाहे तिल लो या ताड़ लो राजा,
राई लो या पहाड़ लो राजा,
मैं अभागा ‘सवर्ण’ हूँ मेरा,
रौंया-रौंया उखाड़ लो राजा ..।
डॉ. कुमार विश्वास की इसी कविता के विरोध और यूजीसी के समर्थन में एक कविता मैं अभागा सवर्ण हूं काफी चर्चा में है।
मैं अभागा सवर्ण हूँ

विश्वविद्यालयों के ऊँचे शिखरों पर,
कुलपति बनकर मेरा ही कुनबा बैठा है,
ज्ञान के हर दरवाजे पर मेरी ही ठाठ है
लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूँ।
अदालतों के कमरों के ‘कोलेजियम’ में,
मेरे ही खानदान के लोग बैठे हैं,
फिर भी न्याय न मिलने पर संविधान को गरियता हूँ
मैं अभागा सवर्ण हूँ।
सचिवालय की अस्सी फीसदी कुर्सियों पर
मेरी जाति के सवर्ण हैं
लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूँ।
मीडिया के कैमरों से लेकर अख़बारों तक,
मेरी ही आवाज़ को ‘जनता’ कहा जाता है,
बहस का हर मुद्दा मेरी ही मजऱ्ी से तय है,
लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूँ।
व्यापार के बड़े बाज़ारों और शेयर मार्केट में,
मेरी ही पूँजी का निर्विरोध साम्राज्य है,
आर्थिक लाभ की हर पहली पंक्ति में मैं हूँ,
लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूँ।
देश के प्रमुख संस्थानों और थिंक-टैंकों में,
विशेषज्ञ बनकर मेरा ही सरनेम बोलता है,
बौद्धिक विमर्श पर मेरा ही एकाधिकार है,
लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूँ।
साहित्यिक मंचों और कला के गलियारों में,
पुरस्कारों की रेवडिय़ाँ अपनों में बँटती हैं,
तारी$फ की हर ताली मेरे ही नाम की है,
लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूँ।
संसद की समितियों और नीति बनाने वालों में,
मेरा ही वर्ग बहुमत में हाथ उठाता है,
हर नियम मेरे ही हितों को देखकर बनता है,
लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूँ।
देश के बड़े अस्पतालों और डॉक्टरी के पेशों में,
निजी प्रैक्टिस से लेकर सरकारी पदों तक मेरा कब्ज़ा है,
सेहत के व्यापार का मैं ही असली मालिक हूँ,
लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूँ।
धार्मिक ट्रस्टों और मंदिरों के गुप्त खज़ानों पर,
पुश्तैनी अधिकार लेकर मेरा ही वंश काबिज़ है,
आस्था के हर धंधे का मैं ही एकमात्र ट्रस्टी हूँ,
लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूँ।
प्राइवेट सेक्टर के बोर्डरूम और ष्टश्वह्र की कुर्सियों पर,
नेटवर्किंग के दम पर मेरा ही भाई-भतीजावाद है,
मेरिट के नाम पर मैंने अपना ही घेरा बनाया है,
लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूँ।
विदेशी छात्रवृत्तियों और ग्लोबल एक्सपोजर में,
मेरे ही बच्चों का रास्ता साफ किया जाता है,
दुनिया को देखने वाली आँखें भी मेरी ही हैं,
लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूँ।
फिल्मों के परदों से लेकर ओटीटी की कहानियों तक,
मेरे ही नायकत्व और मेरी ही पीड़ा का बखान है,
ग्लैमर की हर चमक मेरी ही चौखट से निकलती है,
लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूँ।
तमाम जांच एजेंसियों और सुरक्षा के ओहदों पर,
मेरे ही निर्देश और मेरी ही व$फादारी चलती है,
डर का माहौल हो या सुरक्षा, चाभी मेरे पास है,
लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूँ।
हज़ारों साल की विरासत और संचित विशेषाधिकार,
आज भी मेरी ढाल बनकर समाज में खड़े हैं,
मैं व्यवस्था का विधाता और सत्ता का केंद्र हूँ,
लेकिन मैं अभागा सवर्ण हूँ।