“वंदे मातरम्”—दो शब्द हैं, पर इन दो शब्दों में एक सम्पूर्ण सभ्यता की वेदना, स्मृति, शक्ति और भविष्य की आकांक्षा समाई हुई है

लखनऊ। संविधान संरक्षण मंच के राष्ट्रीय संयोजक गौतम राणे सागर ने वन्दे मातरम् पर चर्चा के दौरान कहा कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने आनंदमठ में मातृभूमि को केवल मिट्टी का एक भू-भाग नहीं माना।
उनके लिए माता वह भूमि है जो अन्न देती है, जल देती है, फल-फूल देती है, शीतल वायु देती है, ज्ञान और संस्कृति को जन्म देती है और अपनी संतानों को जीवन देती है।
इसलिए “वंदे मातरम्” का अर्थ केवल माँ की स्तुति करना नहीं, बल्कि माँ के प्रति अपने कर्तव्य को स्वीकार करना भी है।
यहीं से आज के समय के लिए एक असहज, लेकिन अत्यंत आवश्यक प्रश्न पैदा होता है-क्या केवल “वंदे मातरम्” कह देना मातृभूमि की वंदना है?
यदि माँ की संतान भूखी हो, अशिक्षित हो, बेरोजगार हो, उपचार और शिक्षा के लिए संघर्ष कर रही हो; यदि उसके श्रम की कमाई महँगाई में समाप्त हो जाए, यदि सार्वजनिक धन से बने पुल, सड़कें, भवन और अन्य आधारभूत संरचनाएँ अपनी अपेक्षित उम्र पूरी करने से पहले ही प्रश्नों के घेरे में आ जाएँ—तो क्या केवल ऊँची आवाज में माँ का नाम लेना पर्याप्त है?
बंकिम की दृष्टि से शायद उत्तर होगा—नहीं : माँ की वंदना का सबसे सच्चा रूप माँ की सेवा है। माँ की समृद्धि केवल चमकते भवनों से नहीं होती, आज हम विकास को प्रायः पुलों की ऊँचाई, एक्सप्रेसवे की लंबाई, हवाई अड्डों की भव्यता और रेलवे स्टेशनों की चमक से मापते हैं। लेकिन आनंदमठ की मातृभूमि का प्रश्न इससे कहीं गहरा है। माता तभी सुखदा और वरदा है जब उसकी संतानों के जीवन में सुख और अवसर हों। यदि किसी गाँव का बच्चा अच्छी शिक्षा से वंचित है, यदि किसी युवा के हाथ में योग्यता है लेकिन रोजगार नहीं, यदि किसान अपने श्रम के उचित प्रतिफल के लिए संघर्ष करता है, यदि गरीब परिवार महँगाई के सामने विवश है—तो विकास की चमक के पीछे माता की आँखों में छिपे आँसू दिखाई देने चाहिए।