वैदिक काल से शुरू हुआ रक्षाबंधन केवल धागा बाँधने की रीत नहीं, बल्कि परस्पर विश्वास, सुरक्षा और समर्पण का अमर प्रतीक : राजीव कुमार

लखनऊ / भारत। देश में रक्षाबंधन पर्व सप्ताह चल रहा है। इस मौके पर डीपीआरए के प्रांतीय प्रवक्ता एवं जिला अध्यक्ष, डीपीआरए लखनऊ राजीव कुमार ने बताया कि भारतीय संस्कृति में रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के पवित्र प्रेम और रक्षा के संकल्प का प्रतीक है। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह त्यौहार वैदिक, पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं से जुड़ा है।
इसकी शुरुआत के प्रमुख प्रसंग निम्न हैं:
पौराणिक शुरुआत (देवराज इंद्र और शची) : पौराणिक काल में देवताओं और असुरों के युद्ध के दौरान इंद्र की पत्नी शची ने भगवान विष्णु के मार्गदर्शन में एक पवित्र रक्षा सूत्र इंद्र की कलाई पर बाँधा था, जिससे देवताओं को विजय प्राप्त हुई।
राजा बलि और माता लक्ष्मी : माता लक्ष्मी ने दानवीर राजा बलि को भाई बनाकर राखी बाँधी थी और उपहार के रूप में भगवान विष्णु को पाताल लोक से वैकुंठ वापस लाने का वचन माँगा था। तभी से श्रावण पूर्णिमा पर राखी बाँधने की परंपरा प्रचलित हुई।
श्री कृष्ण और द्रौपदी : महाभारत काल में जब श्री कृष्ण की उंगली से रक्त बहने लगा, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का आँचल फाड़कर उनकी उंगली पर बाँधा था। श्री कृष्ण ने इसके बदले द्रौपदी को हर संकट में रक्षा का वचन दिया और चीरहरण के समय उनकी लाज बचाई।
ऐतिहासिक संदर्भ (रानी कर्णावती और हुमायूँ : मेवाड़ की रानी कर्णावती ने बहादुर शाह के आक्रमण से सुरक्षा के लिए मुगल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजी थी। हुमायूँ ने राखी का मान रखते हुए रानी की रक्षा के लिए अपनी सेना भेजी थी। वैदिक काल से शुरू हुआ रक्षाबंधन केवल धागा बाँधने की रीत नहीं, बल्कि परस्पर विश्वास, सुरक्षा और समर्पण का अमर प्रतीक है।