बाल गंगाधर की  घृणित मानसिकता आज भी बरकरार : राम बहादुर

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तिलक ने कहा था चमार संसद में आकर क्या जूता बनाएंगे ?

लखनऊ। डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय एकता मंच के संयोजक एवं पूर्व आईएएस राम बहादुर का कहना है कि सवर्णों द्वारा दलितों और पिछड़ा वर्ग का विरोध कोई नया नहीं है। हां लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन सवर्णों के विरोध का तरीका जरूर बदल गया है। केन्द्र सरकार द्वारा यूजीसी के नये नियम लागू करने की बात कही गयी तो सवर्ण समाज एकजुट होकर यूजीसी के नये नियमों का विरोध करने लगा और उसका यह विरोध तबतक जारी रहा, जबतक इन नियमों पर प्रभावी रोक नहीं लग गयी। उनका कहना है कि दलितों के विरोध की यह कथा किसी एक दिन की नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही उस पीड़ा, प्रतिरोध और संघर्ष की है, जो भारत की आत्मा में दबी रही और फिर एक दिन फूट पड़ी। यह कथा उस दिन से भी जुड़ी है जब शहीद जगदेव प्रसाद का जन्म हुआ, एक ऐसे योद्धा का जन्म, जिसने व्यवस्था से सवाल करने का साहस किया।

 

देश में शहीद जगदेव प्रसाद  के उदय के साथ  राजनीतिक बदलाव का भी उभार हुआ

राम बहादुर का कहना है कि औपनिवेशिक भारत में सामाजिक बराबरी की बात करना भी अपराध जैसा था। उसी दौर में एक कथन ने दलित-पिछड़े समाज की चेतना को झकझोर दिया। जब बाल गंगाधर तिलक से जोड़ा जाने वाला यह वाक्य सामने आया:- ‘गड़ेरिया, नाई, धोबी, बढ़ई, लोहार, कोईरी, कुर्मी, मल्लाह, तेली, चमार आदि संसद में आकर क्या करेंगे? क्या तेल पेरेंगे, हल जोतेंगे, कपड़ा धोएंगे, जूता बनाएंगे? ‘ बाल गंगाधर तिलक का यह सिर्फ एक बयान नहीं था, यह उस सोच का निचोड़ था, जिसमें संसद, शासन और ज्ञान पर कुछ गिने-चुने वर्गों का जन्मसिद्ध अधिकार मान लिया गया था। यहीं से दलित-पिछड़ों के भीतर एक उभार शुरू हुआ। सवाल उठने लगे, क्या मेहनतकश का दिमाग नहीं होता? क्या शासित होने वाला कभी शासक नहीं बन सकता? फिर शहीद जगदेव प्रसाद का उदय हुआ, और राजनीतिक बदलाव का भी उभार हुआ।

उन्होंने साफ कहा था- ‘सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है। ‘उनकी राजनीति सिर्फ सत्ता पाने की नहीं थी, बल्कि सत्ता की संरचना बदलने की थी। उन्होंने मांग रखी:-जमीन में हिस्सेदारी, नौकरी में हिस्सेदारी व व्यापार में हिस्सेदारी और सबसे बढक़र शासन-प्रशासन में जनसंख्या के अनुपात में हिस्सेदारी। दलितों व पिछड़ा वर्ग के लिए यह कोई ‘रियायत’ नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी शर्त थी। भारत आज़ाद हुआ, संविधान बना, समानता लिखी गई लेकिन ज़मीन पर हकीकत बदली नहीं। आज भी उच्च संस्थानों में प्रतिनिधित्व असमान है। नीति-निर्माण करने वाली जगहों पर वही चेहरे बार-बार दिखते हैं। ससी/एसटी/ ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदाय आज भी सिस्टम के बाहर धकेले जाते हैं।

यूजीसी के नये नियमों के पक्ष में हमें होना होगा एकजुट

राम बहादुर का कहना है कि भेदभाव अब खुले शब्दों में नहीं, बल्कि, ‘मेरिट ‘ ‘न्यूट्रैलिटी ‘ ‘क्वालिटी ‘ जैसे शब्दों के पीछे छिपकर होता है।
यह सवाल अक्सर पूछा जाता है ‘अब आरक्षण या संरक्षण क्यों? ‘लेकिन सही सवाल यह है, जब असमानता अब भी मौजूद है, तो बराबरी के औज़ार क्यों हटाए जाएं? इन समुदायों के लिए विशेष कानून इसलिए ज़रूरी हैं क्योंकि, ऐतिहासिक बहिष्कार को केवल ‘बराबरी के का$गज़’ से नहीं मिटाया जा सकता सामाजिक पूंजी (नेटवर्क, अवसर, प्रभाव) आज भी असमान है। बिना संरक्षण के लोकतंत्र केवल संख्या का खेल बनकर रह जाता है। आज शहीद जगदेव प्रसाद की जयंती सिर्फ स्मरण का दिन नहीं, बल्कि संकल्प का दिन है। संकल्प लें कि संसद हर वर्ग की आवाज़ बने, नीति-निर्माण में मेहनतकश समाज की हिस्सेदारी हो और भारत का लोकतंत्र सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि सामाजिक लोकतंत्र बने। यह कहानी खत्म नहीं हुई है। यह आज भी लिखी जा रही है, हर उस सवाल में, हर उस आंदोलन में, जो बराबरी की बात करता है। यूजीसी के नये नियमों को लागू करने की मांग को लेकर एकजुट होने की जरूरत है, जैसा सवर्ण समाज इसके विरोध में एकजुट हुआ है।

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