मथुरा में दलित बस्ती खाली कराने की तैयारी

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सुप्रीम कोर्ट का आदेश दरकिनार, 7 दिन में दलित बस्ती खाली करने का आदेश

लखनऊ। आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चन्द्रशेखर आजाद ने यूपी के जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह को पत्र लिखकर सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का पालन कराने का अनुरोध किया है। आजाद ने जलशक्ति मंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि अपर खण्ड आगरा नहर, मथुरा द्वारा अनुसूचित जाति बहुल आबादी को खाली करने के लिए 19 जनवरी 2026 को 7 दिन का अवैध बेदखली नोटिस दिया है। आजाद ने जलशक्ति मंत्री को लिखे पत्र में कह है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विशेष अनुमति याचिका (सिविल) में 10 अप्रैल 2023 को पारित आदेश में यद्यपि याचिका खारिज की गई, तथापि राज्य सरकार को पुनर्वास की योजना शीघ्र लाने का स्पष्ट निर्देश दिया गया था। शीर्ष कोर्ट के न्यायिक निर्देश के बावजूद, कार्यालय सहायक अभियन्ता द्वितीय, अपर खण्ड आगरा नहर, मथुरा द्वारा नोटिस 19 जनवरी को नोटिस जारी कर, खसरा संख्या 291, कृष्णा नगर स्थित संजय नगर, राम नगर, जनपद मथुरा में निवासरत नागरिकों को मात्र 07 दिवस के भीतर बेदखली की चेतावनी दी गई है।

असपा प्रमुख ने जलशक्ति से की बेदखली कार्यवाही रोकने की मांग

उन्होंने आगे लिखा है कि यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि उक्त क्षेत्र में लगभग 700 लोगों की आबादी निवासरत है, जिसमें बड़ी संख्या अनुसूचित जाति की है। ये परिवार वर्षों से यहां निवास कर रहे हैं तथा सामाजिक आर्थिक रूप से अत्यंत कमजोर स्थिति में हैं। बिना किसी पुनर्वास योजना, वैकल्पिक आवास अथवा सामाजिक प्रभाव आकलन के इतनी बड़ी आबादी को अचानक बेदखली का आदेश देना- सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की स्पष्ट अवहेलना है। साथ ही संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 17, 21 एवं 46 की भावना के प्रतिकूल है। इसके अलावा अनुसूचित जाति समुदाय के प्रति राज्य की विशेष संवैधानिक जिम्मेदारी की अनदेखी है और यह सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध एक असंवेदनशील एवं दमनकारी प्रशासनिक कार्यवाही है। यह कार्यवाही न केवल न्यायालय के निर्देशों की उपेक्षा है, बल्कि अनुसूचित जाति बहुल गरीब परिवारों को बेघर कर उनके जीवन और गरिमा के अधिकार पर सीधा आघात भी है।

उन्होंने पत्र में लिखा है कि जब तक राज्य सरकार द्वारा पुनर्वास योजना घोषित एवं लागू नहीं कर दी जाती, तब तक किसी भी प्रकार की बेदखली कार्यवाही पर पूर्ण रोक लगाई जाए। लगभग 700 लोगों की अनुसूचित जाति बहुल आबादी को प्रभावित करने वाली इस कार्यवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जांच कर उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाए। यदि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों एवं अनुसूचित जाति समुदाय के संवैधानिक अधिकारों की इस प्रकार अनदेखी को रोका नहीं गया, तो यह सामाजिक न्याय और विधि के शासन के लिए गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।

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