डर के बाद भी उम्मीद : भारतीय मुसलमान और लोकतंत्र की परीक्षा

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भारतीय मुसलमान केवल इतना चाहता है कि कानून उसे डराए नहीं

              इरशाद राही

भारतीय मुसलमान की कहानी को अक्सर दो सिरों में बाँट दिया जाता है-या तो उसे संदेह की नजऱ से देखा जाता है, या फिर वह केवल आँकड़ों और बहसों का विषय बनकर रह जाता है। लेकिन इन दोनों के बीच जो छूट जाता है, वह है एक साधारण नागरिक का जीवन-उसका डर, उसकी मेहनत, और इस देश से उसका गहरा जुड़ाव। यह सच है कि बीते वर्षों में मुसलमानों ने असुरक्षा, सामाजिक दूरी और संस्थागत कठिनाइयों को महसूस किया है। रोजग़ार, आवास, बैंकिंग और सार्वजनिक अभिव्यक्ति-कई क्षेत्रों में यह अनुभव आम रहा है कि बराबरी कागज़़ों में है, व्यवहार में नहीं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भारतीय मुसलमान ने आज तक इस देश से अलग होने की भाषा नहीं बोली। उसकी मांग अलगाव की नहीं,सम्मानजनक साझेदारी की रही है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त उसकी आत्मालोचना की क्षमता होती है। जब किसी समुदाय की इबादत, उसकी बस्तियां उसकी असहमति डर के वातावरण में देखी जाने लगे, तो यह सवाल केवल उस समुदाय का नहीं रह जाता-यह पूरे लोकतंत्र की परीक्षा बन जाता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी समाज के एक हिस्से को लगातार सशर्त नागरिक की तरह देखा गया,तो उसका असर पूरे राष्ट्र की सामाजिक सेहत पर पड़ा। लेकिन इस सच्चाई का एक दूसरा पहलू भी है, जिससे मुँह मोडऩा आत्मघात होगा। मुस्लिम समाज को यह स्वीकार करना होगा कि शिक्षा, आर्थिक तैयारी और संस्थागत मज़बूती में उससे भी चूकें हुई हैं।

भावनात्मक प्रतिक्रियाओं ने कई बार व्यावहारिक तैयारी की जगह ले ली। अब समय है शिकायत की राजनीति से निकलकर तैयारी की संस्कृति बनाने का। यह लड़ाई नारे से नहीं जीती जाएगी, यह लड़ी जाएगी। क्लासरूम में, कोर्टरूम में, और रोज़मर्रा के ईमानदार नागरिक व्यवहार में। गैर-मुस्लिम समाज के लिए भी यह आत्ममंथन आवश्यक है कि मुसलमान को केवल पहचान के चश्मे से नहीं, एक सह-नागरिक के रूप में देखा जाए। क्योंकि लोकतंत्र बहुसंख्यक की सुविधा से नहीं, अल्पसंख्यक की सुरक्षा से मजबूत होता है। भारतीय मुसलमान कोई विशेषाधिकार नहीं मांगता। वह केवल इतना चाहता है कि कानून उसे डराए नहीं, संस्थान उसे बाहर न करें, और समाज उसे शक की तरह न देखे। यह देश सत्ता से बड़ा है, और संविधान हर सरकार से लंबा जीवन रखता है। अगर हम यह मान सकें कि मुसलमान का भविष्य भारत के भविष्य से अलग नहीं,तो शायद हम डर से गरिमा की ओर एक कदम बढ़ा सकें। और यही कदम एक बेहतर भारत की शुरुआत हो सकता है।

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