हाईकोर्ट की फटकार के बाद जिला प्रशासन ने खुलवाया लॉज
लखनऊ। हमीरपुर जिले के भरुआ सुमेरपुर क्षेत्र में पुलिस द्वारा एक निर्दोष व्यक्ति का लॉज और आरा मशीन सील किये जाने की घटना को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बहुत ही गंभीरता से लिया है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ रंजन की पीठ ने तत्काल वादी फहीमुद्दीन, मोइनुद्दीन की आरा मशीन और लॉज की सील खोलने और इन्हें घर आने-जाने के लिए पुलिस सुरक्षा दिये जाने के निर्देश दिये। कोर्ट ने कहा कि जब पुलिस की एफआईआर में वादियों का नाम नहीं है तो किस आधार पर इनकी प्रापर्टी व आरा मशीन को सील करने की कार्रवाई की गई। कोर्ट ने तत्काल वादी के लॉज और आरा मशीन के सील को खोलने व आवास पर पुलिस प्रोटेक्शन देने का निर्देश दिया और नौ फरवरी को अगली सुनवाई में अतिरिक्त महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी अपना पक्ष रखें, इस दौरान किसी भी तरह की कोई उत्पीड़नात्मक कार्रवाई न की जाए। अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कोर्ट को भरोसा दिया कि वादी के खिलाफ किसी भी तरह का कोई उत्पीड़न नहीं किया जाएगा।

बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के लोगों ने फहीमुद्दीन के घर पर पथराव किया
इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सैयद फरमान अहमद नकवी ने बताया कि 15 जनवरी को हमीरपुर जिले के भरुआ सुमेरपुर निवासी एक व्यक्ति ने फहीमुद्दीन के चचेरे भाई के खिलाफ उसकी बेटी से बलात्कार करने व पिस्तौल दिखाकर धर्मांतरण कराने की एफआईआई संबंधित थाने में दर्ज करायी। इस एफआईआर के आधार पर पुलिस ने अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया और जो भी पुलिसिया कार्रवाई करनी थी की, लेकिन इस बीच अभियुक्त के चचेरे भाई, चाचा और चाची जिनका इस मामले से कोई लेनादेना नहीं है और न ही इस मामले में लड़की या लड़की के पिता ने पुलिस में कोई शिकायत की और न ही एफआईआर में इनका नाम है। बावजूद इसके घटना के दूसरे दिन बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के लोगों ने फहीमुद्दीन के घर पर पथराव किया, जिला प्रशासन ने उनका लॉज सील किया और वन विभाग ने उनकी आरा मशीन सील कर दी, जबकि आरा मशीन के रजिस्ट्रेशन के लिए वन विभाग में पहले से अप्लाई किया जा चुका है और ये आरा मशीन वे चालीस साल से चला रहे हैं।
हमीरपुर जिले के भरुआ सुमेरपुर का मामला

उनका कहना है कि फिलहाल कोर्ट के आदेश पर जिला प्रशासन ने लॉज की सील खोल दी है। लेकिन सवाल ये उठता है कि किसी निर्दोष के खिलाफ किसी भी संगठन द्वारा इस तरह की कार्रवाई करना और जिला व पुलिस प्रशासन द्वारा हिंसा करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करना कहां तक सही है। नकवी ने बताया कि इस मामले में न्यायालय ने दोनों पक्षों की विस्तृत प्रारंभिक दलीलें सुनीं और अतिरिक्त महाधिवक्ता को निर्देश दिये कि अगली सुनवाई तक वादी के खिलाफ किसी भी तरह की कोई बुलडोजर कार्रवाई नहीं की जाएगी। इस पर उन्होंने कोर्ट को भरोसा दिया कि किसी भी तरह उत्पीड़नात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। कोर्ट के समक्ष सैयद फरमान अहमद नकवी के साथ शमसुद्दीन खान, सैयद अहमद फैजान, जहीर असगर ने वादी का पक्ष रखा।
पीड़ित पक्ष की पुलिस सुरक्षा का कोर्ट ने दिया निर्देश

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह अदालत ऐसे कई मामलों की गवाह है जहां अपराध करने के तुरंत बाद आवास स्थान पर रहने वाले व्यक्तियों को विध्वंस का नोटिस जारी किया जाता है। और उसके बाद, वैधानिक आवश्यकताओं की स्पष्ट पूर्ति के बाद उसे ध्वस्त कर दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद,ये तोड़-फोड़ जारी रही है, जिसमें यह सिद्धांत दिया गया था कि इमारतों को सजा के तौर पर तोड़ना शक्तियों के बंटवारे का उल्लंघन है क्योंकि सज़ा देने का अधिकार न्यायपालिका के पास है। इसलिए, इस मामले की व्यापक प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, जिसमें राज्य का किसी ढांचे को गिराने का अधिकार और अनुच्छेद 14 और 21 के तहत उसके रहने वालों के अधिकार शामिल हैं, और पिछले पैराग्राफ में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद राज्य में ये तोड़-फोड़ कैसे जारी हैं, जिसमें कहा गया था कि इमारतों को सजा के तौर पर गिराना प्रतिबंधित होगा, यह कोर्ट इस मामले से सीधे जुड़े कुछ कानूनी सवाल तैयार करना ज़रूरी समझता है।
ये वे सवाल हैं जिन पर यह कोर्ट पार्टियों से जवाब देने की उम्मीद करता है। क्या इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन नहीं किया गया है, खासकर उस फैसले के पैराग्राफ 85 और 86 के संदर्भ में?, कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या गिराने का अधिकार, किसी ढांचे को गिराने के काम को सही ठहराता है या, क्या राज्य पर पेरेन्स पेट्रिया के आधार पर यह कर्तव्य है कि सार्वजनिक ज़रूरत/उद्देश्य के अभाव में किसी रहने की जगह को न गिराए?,क्या किसी अपराध के होने के तुरंत बाद किसी ढांचे को गिराने की दिशा में उठाए गए कदम कार्यकारी विवेक का दिखावटी इस्तेमाल होंगे? हाई कोर्ट राज्य के किसी ढांचे को गिराने के वैधानिक अधिकार और अनुच्छेद 21 और 14 के तहत आम नागरिक के इसे रोकने के मौलिक अधिकार के बीच टकराव वाले हितों को कैसे संतुलित करेगा?