मान्यवर की रहनुमाई दिल में लिए “देव”, सीखा है इसी दर से बहुजन का सिपर होना

देव प्रताप सिंह ( प्रबुद्ध भारत निर्माण संघ)
कबीर से सीखा है मैंने सुख़नवर होना,
हर लफ़्ज़ में सच कहना, बेख़ौफ़ असर होना।
माता सावित्रीबाई से तअल्लुक़ है मेरा,
अश्आर में इल्म का रौशन सा सफ़र होना।
रैदास से कर्म की राहों का हुनर पाया,
तथागत से सीखा है धम्म से बशर होना।
हज़रत_अली की सीरत, हुसैन का जज़्बा भी,
हक़ के लिए हर साँस का फ़ना दर फ़ना होना।
जब वक़्त-ए-सितम आए, जब ज़ुल्म सर उठाए,
कलम से भी मुमकिन है बारूद_असर होना।
भगत सिंह की फ़िक्रों ने यह रंग सिखाया है,
इंसाफ़ की ख़ातिर हरदम बाग़ी नज़र होना।
फुले साहब से सीखा तालीम का पैग़ाम,
उस्ताद बनो ऐसा, रौशन हर घर होना।
बाबा साहब ने बख़्शी शऊर की दौलत भी,
इंसाँ को बराबर का हक़दार-ए-नज़र होना।
क्यों करते हो दुनिया की बेकार सी बातें तुम,
मेरे लिए काफ़ी है बहुजन का सफ़र होना।
मान्यवर की रहनुमाई दिल में लिए “देव”,
सीखा है इसी दर से बहुजन का सिपर होना।
शब्दों के अर्थ
सिपर अर्थात ढाल
बशर का अर्थ जागरूक व्यक्ति