ममता के संघ के प्रति नरम रवैये का नतीजा है बंगाल में भाजपा की जीत

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ममता के दलित-मुस्लिम एकता के नारे के आगे मजबूत पड़ा भाजपा का हिन्दुत्व 

कमल जयंत

यूपी के पूर्व अपर परिवहन आयुक्त अशोक कुमार ने पश्चिम बंगाल में टीएमसी के हार के कारणों की समीक्षा की है। उनके मुताबिक बंगाल में 3 मुख्य मतदाता समूह है – दलित 24 फीसदी, मुस्लिम 30 फीसदी, आदिवासी 6 फीसदी, जबकि कुर्मी/महतो 50 लाख व शेष अन्य बिरादरी के लोग हैं। दलितों में मुख्य रूप से नमोशूद्र, राजवंशी जाति आती है जो कुल दलित जनसंख्या का 36 फीसदी है। नमोशूद्र जिन्हें मटुआ समुदाय के नाम से जाना जाता है जो उत्तरी 24 परगना, नादिया, कूचबिहार, मालदा , दक्षिण 24 परगना में पाये जाते है।

नमोशूद्र पूर्व पाकिस्तान ( बांग्लादेश) से 1947 व 1971 में शरणार्थी के रुप में बंगाल में बसे। राजवंशी उत्तरी बंगाल के दार्जिलिंग, कूचबिहार, अलीपुर द्वार के आसाम से सटे जिला में रहते हैं। दोनों की जनसंख्या लगभग 18-18फीसदी है। दोनों ही समूह अपने क्षेत्रों में राजनैतिक दृष्टिकोण से अति महत्वपूर्ण हैं। 34 वर्ष के वाम शासन के दौरान दलित कम्युनिस्ट पार्टियों को वोट देते रहे। 2011 के चुनाव में टीएससी को वोट देकर सरकार बनवाई जिसमें आरएसएस के कैडर का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। क्योंकि संघ का एक उद्देश्य कम्युनिस्ट पार्टी को बंगाल से हटाना था जो वहां आरएसएस के विस्तार में बाधक थी और जिसे संघ ने ममता बनर्जी को अंदरुनी सपोर्ट कर अपना पहला लक्ष्य हासिल किया।

दलित-मुस्लिम मिलाकर 54 फीसदी फिर भी चुनाव नहीं जीत सकीं ममता

पश्चिम बंगाल में दलितों और मुस्लिमों का वोट लगभग 54 फ़ीसदी है बावजूद इसके ममता इन्हें एकजुट करने में काम्यं नहीं हो पायीं जबकि बसपा के संस्थापक कांशीराम जी ने यूपी में दलितों, पिछड़ों और मुस्लिमों को एकजुट करके राज्य में चार बार बसपा की सरकार बनायीं थी।

संघ के नेताओं ने मंच पर ममता को ’मां दुर्गा अवतार’ कहकर सम्बोधित किया

अशोक कुमार का कहना है कि यहां यह भी उल्लेखनीय है कि ममता बनर्जी 2003 में वाजपेयी सरकार में मंत्री रहीं और सितम्बर 2003 में आरएसएस द्वारा आयोजित एक पुस्तक विमोचन समारोह में उनका स्वागत किया गया तथा संघ के नेताओं ने मंच पर ममता को ’मां दुर्गा अवतार’ कहकर सम्बोधित किया। बंगाल में ममता सरकार बनने के बाद 2011 में संघ की शाखाएं 250 थीं, वह बढक़र वर्तमान में 2500 हो गयीं। इसी प्रकार ममता सरकार में संघ ने आदिवासी बहुल क्षेत्र जंगल महल, दलित क्षेत्र 24 परगना, कूचबिहार व उत्तरी बंगाल में अपनी शाखाओं में उल्लेखनीय वृद्धि कर बड़े पैमाने पर सरस्वती शिशु मंदिर, एकल विद्यालय खोल कर सांस्कृतिक फैलाव किया। 2017 से 2019 के मध्य संघ ने रामनवमी के अवसर पर शक्ति प्रदर्शन कर भाजपा के लिए मजबूत वोट बैक तैयार किया।

ममता बनर्जी ने कभी भी मुखर होकर संघ की आलोचना नहीं की

ममता बनर्जी ने कभी भी मुखर होकर संघ की आलोचना नहीं की जिससे 2011 के बाद से संघ के असीमित विस्तार के कारण भाजपा के वोट प्रतिशत मे उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इस बीच भाजपा का विधान सभा चुनाव 2011 में भाजपा का वोट 4.06 फीसदी थी, जो 2016 में बढक़र 10.02 फीसदी और 2021 में 38.5 फीसदी हो गया। इसी प्रकार लोकसभा चुनाव में बंगाल में 2014 में भाजपा को 17 फीसदी, 2019 में 40.07 फीसदी व 2024 में 39.1 फीसदी वोट मिला। भाजपा के वोटों की इस वृद्धि में दलित विशेषकर मटुआ तथा राजवंशी समुदाय का बड़ा योगदान रहा। स्मरण रहे कि 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी जी ने मटुआ महासंघ की प्रमुख राना मां के पास जाकर चरण छूकर समर्थन का आशीर्वाद मांगा था। इस दौरान अमित शाह ने मटुआ समुदाय की बड़ी समस्या ‘नागरिकता’ देने का आश्वासन भी दिया था जो अभी भी पूर्णतया हल नहीं हो पाई है।

मटुआ समुदाय को साधने में सफल रही भाजपा

भाजपा ने मटुआ समुदाय को साधने के लिए शान्तनु ठाकुर को केंद्र में मंत्री बनाया, वहीं ममता सरकार ने इसी समुदाय व शांतनु ठाकुर के परिवार की ममताबाला ठाकुुर को राज्यसभा सदस्य बनाया। वर्तमान में दलित भाजपा व टीएमसी में बंटा है। बंगाल में मुस्लिम समुदाय कांग्रेस के साथ रहा है किंतु बाद में यह कम्युनिस्ट पार्टी से होता हुआ टीएमसी समर्थित हो गया। चूकि मुस्लिम आबादी 30 फीसदी के आसपास है इसे बांटने के उद्देश्य से एआईएमआईएम को साधा गया, अपेक्षित परिणाम न आने पर इस चुनाव में टीएमसी के पूर्व विधायक व पूर्व नौकरशाह’ हुमायूं कबीर ‘ को रणनीतिक तौर पर स्थापित किया गया। जो अपने क्षेत्र में हाल ही में बाबरी मस्जिद के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर कार्यक्रम कर चर्चित हुए। हुमायूं कबीर 2018 स े2021 तक भारतीय जनता पार्टी में भी रहे हैं। बंगाल में मुस्लिम व दलित वोटों के बिखराव का का फायदा भाजपा को मिला। बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी ने टीएमसी को हराने की जो रणनीति बनायी, उसमें वह सफल रही। इसी का नतीजा रहा कि चुनाव में इसका फायदा भाजपर करा मिला और वह दो तिहाई बहुमत लाकर बंगाल में सरकार बनाने में सफल रही।

कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के भाजपा में शामिल होने का फायदा हिंदुत्व वादी दल को मिला

भारतीय जनता पार्टी का बंगाल में संगठनात्मक आधार सुदृढ़ नहीं था इसलिए वह विधानसभा चुनाव 2026 में आरएसएस संगठन व उसकी रणनीति, हिंदू – मुस्लिम ध्रुवीकरण, औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत उतर भारतीय प्रवासी, मारवाडिय़ों का आर्थिक प्रभाव तथा बड़े पैमाने पर भद्र जनों ( ब्राह्मण बुद्धिजीवी, इंजीनियर, डाक्टर, लेखक, शिक्षक) जो 2018 में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के आरएसएस मुख्यालय नागपुर के कार्यक्रम में शामिल होने के बाद से संघ से जुड़े तथा दलित वोटों व टीएमसी में असंतोष पर निर्भर था। ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के भाजपा में शामिल होने का फायदा हिंदुत्व वादी दल को मिला। फिलहाल बंगाल में इस बार चुनाव में शुरू से ही ममता बनर्जी के सामने बड़ा राजनैतिक संकट खड़ा रहा। लेकिन समय रहते वह इस समस्या का समाधान करने में असफल रहीं। वैसे बंगाल में दलित बहुजन दल प्रभावहीन है। कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही थी क्योंकि बंगाल में इसका कोई जनाधार वाला नेता व सक्षम संगठन नहीं है। संसाधन व रणनीति में संघ- भाजपा अन्य दलों से फिलहाल आगे रही। वहीं ममता ने भाजपा द्वारा उनकी मुस्लिम परस्त छवि की काट में गंगा सागर में हिंदू जगन्नाथ मंदिर व कोलकोता में ‘ दुर्गा आंगन ‘ का निर्माण करातीं, लेकिन वह भी काम नहीं आया।

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