इसे सीएए और एनआरसी से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, जिसकी वजह से लोग भ्रमित हैं
कौमी मशावरत के अध्यक्ष सैयद अबुल बरकात नजमी का कहना है कि एसआईआर (मतदाता गहन पुननिरीक्षण) को लेकर लोग काफी परेशान हैं। दरअसल निर्वाचन आयोग ने एसआईआर को मतदाता सूची में नाम जुड़वाने वाला नहीं बल्कि सीएए और एनआरसी की तरह पेश किया है। इसे नागरिकता का प्रमाण पत्र से जोडऩे का प्रयास किया जा रहा है, जिसकी वजह से लोग भ्रमित हैं और उन्हें यह लगने लगा है कि अगर एसआईआर के तहत उनका नाम वोटर लिस्ट में नहीं जुड़ा तो वे देश के नागरिक नहीं रह जाएंगे, ऐसे में उन्हें देश छोडक़र जाना पड़ेगा।
अपने मूल निवास के प्रमाण पत्र बनवाने के लिए लोग तहसील के चक्कर लगा रहे हैं। सबसे ज्यादा भ्रम की स्थिति तो दलित, मलिन और मुस्लिम बस्तियों में रह रहे लोगों में है। एसआईआर का प्रथम चरण खत्म हो गया, अब दूसरे चरण की तैयारी चल रही है। खुशी की बात यह है कि सामाजिक संगठनों ने इन बस्तियों में अभियान चलाकर लोगों के जरूरी कागजात बनवाने के साथ ही उनके नाम भी मतदाता सूची में जुड़वाने के लिए व्यापक अभियान चलाया। उन्होंने कहा कि कौमी मुशावरत संस्था का गठन ही समाज में सांप्रदायिक सौहार्द को कायम रखने के मकसद से किया गया है। हमें इस बात की खुशी है कि हमारी संस्था अपने इस मकसद में कामयाब रही है। हमारी संस्था इंसानियत की बात करती है, जिलों-जिलों में सेमिनार, सभाएं करके हमारी संस्था सांप्रदायिकता के खिलाफ भाईचारा और अमन का पैगाम देने में सफल है। सांप्रदायिकता के खिलाफ हम कोई उग्र आंदोलन नहीं चला रहे बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए आपसी एकता के प्रयास कर रहे हैं और इसमें हमें सफलता भी मिल रही है। सैयद अबुल बरकात नजमी ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी संस्था किसी भी सियासी दल के साथ मिलकर काम नहीं कर रही है, जो भी दल संविधान सम्मत बात करते हैं, या संविधान के मद्देनजर कोई प्रस्ताव देते हैं, हम उसे मानते हैं। क्योंकि देश संविधान से चलता है और भारतीय संविधान में देश के गरीबों, मजलूमों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के सारे अधिकार निहित हैं।