एक पैर पर खड़े रहना, शरीर को किसी ताप में तपाना व्रत नहीं है

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पशु पक्षी नभचर जलचर सभी नियम का पालन करते हैं

शिवचरण चौहान

व्रत का अर्थ भूखे रहकर कोई साधना करना नहीं है। व्रत का मतलब किसी उपासना से नहीं है। व्रत यानी नियम संयम का पालन करना ही व्रत है। किसी समय विशेष पर्व विशेष पर भूखे रहकर निराहार रहकर आप शरीर को स्वस्थ कर सकते हैं या शरीर को क्षति पहुंचा सकते हैं। पर केवल यही व्रत नहीं है यही उपासना नहीं है। व्रत करना है तो हमें प्रकृति सीखना होगा। सूर्य चंद्रमा वायु और मौसम यह सभी व्रती है। नियमित व्रत करते हैं। संयम नियम का पालन करते हैं। पशु पक्षी नभचर जलचर सभी नियम का पालन करते हैं। एक मनुष्य ही है कि वह सारे नियम तोड़ कर आजाद रहना चाहता है और फिर व्रत उपवास करने का नाटक करता है। वह चाहता है कि सारे नियम तोड़े और कोई उसे कुछ ना कहें। उसे कोई दुष्परिणाम ना भोगना पड़े।

हमारे आदि ग्रंथों यानी वेदों में किसी व्रत उपवास का जिक्र नहीं है

सबसे बड़े व्रत करने वाले सूर्य चंद्रमा और वायु, मौसम है। करोड़ों वर्षों से सूर्य नियमित व्रत करता आया है। रोज एक निश्चित समय पर उगना और निश्चित समय पर डूबना सूर्य का व्रत है। चंद्रमा का निश्चित समय पर उगना एक निश्चित समय पर है डूबना व्रत है। वैज्ञानिक भाषा में सूर्य स्थिर है और सारी दुनिया को प्रकाशमान करता है उसका यह व्रत कभी खंडित नहीं होता है। चंद्रमा सूर्य की परिक्रमा करता है और उसका यह व्रत भी नियमित है। मौसम समय अनुसार आते जाते रहते हैं। वायु और मौसम व्रत का नियम संयम का पालन करते हैं। अगर मौसम का व्रत खंडित होता है तू सारी सृष्टि पर इसका प्रभाव पड़ता है। इसलिए हमारे ग्रंथों में कहा गया है की व्रत नियम संयम का पालन होता है।

निराहार और फलाहार ही केवल व्रत नहीं है। निराहार रहकर हम अपने शरीर के शुद्धि,नाड़ियों की शुद्धि कर सकते हैं पर परमात्मा की प्राप्त नहीं कर सकते। परमात्मा की प्राप्ति सत्य की प्राप्ति देवी की प्राप्ति तो नियम संयम का पालन करने से ही हो सकती है। व्रत की परिभाषा पदम पुराण में बताई गई है। पद्म पुराण में कहा गया है हिंसा छोड़ देना, झूठ न बोलना चोरी न करना , दुष्चरित्र से दूर होना और परिग्रह विरक्त होना व्रत कहलाता है। वही सच्चा व्रती है जो इन का पालन करता है। दुर्गुणों का त्याग करना और सद्गुनों को अपनाना ही व्रत है। नवरात्र या अन्य पावन अवसर पर बुरी वृत्तियों का त्याग ही व्रत है। भर्थहरि नीति शतक में व्रत की परिभाषा दी गई है। दिए गए धान को गोपनीय रखना। आए हुए अतिथि का सत्कार करना। किसी की भलाई करते हैं शांत रहना उसे प्रकट न करना। अपनी संपत्ति और पद पर गर्व ना करना। दूसरों की निंदा ना करना यही असली व्रत है।

व्रत का अर्थ भूखे रहकर कोई साधना करना नहीं है

इन व्रतों का कठोरता से पालन करना ही मनुष्य को देवत्व की ले जाता है। यह व्रत कठिन है इनका पालन करना सबके बस की बात नहीं है। निराहार और फलाहार तो पशु पक्षी भी करते हैं। बहुत से लोगों को अन्न न मिलने के कारण पूरे दिन भूखा रहना पड़ता है। यह व्रत नहीं है। पद्म पुराण इन्हीं को व्रत कहा गया है। भरथरी ने भी इन्हीं सद्गुणों के गुण गाए हैं और इन्हें ही व्रत कहा है। हमारे आदि ग्रंथों यानी वेदों में किसी व्रत उपवास का जिक्र नहीं है। भूखे रहना, अपने आसपास आग जला देना, एक पैर पर खड़े रहना, शरीर को किसी ताप में तपाना व्रत नहीं है। अगर भूखे रहना निराहार रहना से किसी की उम्र बढ़ती या परमात्मा की प्राप्त होती है तो अब तक सारी दुनिया मोक्ष पा गई गई होती। व्रत उपवास का प्रचार प्रसार करना डाकू चला है दिखावा है। इससे बचना चाहिए।

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