बारह रबी-उल-अव्वल के जलूस में नौजवानों का रक़्स (डांस) तशवीशनाक (चिंताजनक) : मास्टर शाहिद बरकाती

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उलेमा और क़ाज़ियान-ए-शहरे (शहर के काज़ियों) से नबी ए रहमत की याद में निकलने वाले जलूस की पवित्रता को ठेस पहुँचाने वाली हरकतों के ख़िलाफ़ अपनी ज़िम्मेदारी निभाने की अपील

कानपुर। रहमतुल-लिल-आलमीन (दुनिया के लिए रहमत) की याद में उठने वाले  ऐतिहासिक ‘जलूस-ए-मुहम्मदी’ में आशिक़ान-ए-रसूल (रसूल से मोहब्बत करने वालों) की शिरकत जहाँ ख़ुश आइंद (सकारात्मक) है, वहीं जलूस में कुछ नौजवानों की तरफ़ से फ़हश (अश्लील) और जलूस का तक़द्दुस (पवित्रता) पामाल करने वाली ग़ैर-अख़लाक़ी (अनैतिक) हरकतें नबी की शान में गुस्ताख़ी के साथ पूरी मिल्लत-ए-इस्लामिया (मुस्लिम समुदाय) के लिए यह बेहद चिंताजनक बात है।

क़ाज़ियान-ए-शहरे और उलेमा को सरकारी गाइडलाइंस का पालन करते हुए जलूस की पवित्रता को ठेस पहुँचाने वाली हरकतों के ख़िलाफ़ एकजुट होकर अपनी ज़िम्मेदारी निभाने की ज़रूरत है, ताकि भविष्य में इस तरह की हरकतों पर रोक लगाई जा सके। ‘बज़्म-ए-क़ासिमी बरकाती’ कानपुर के नाज़िम (प्रबंधक) आला मास्टर शाहिद बरकाती ने कहा कि इस साल जलूसों में कुछ अंजुमनों (कमेटियों) और उसमें शामिल नौजवानों ने जिस तरह फ़िल्मी गानों पर डांस किया, मस्जिद-ए-नबवी और ख़ाना-ए-काबा की

तस्वीरें और कलमा लिखे झंडों को ज़मीन से छुआ कर बेहुरमती जैसी हरकतें कीं, उससे जलूस की पवित्रता को ठेस पहुँची है। वह बहुत चिंताजनक बात है। इसके अलावा जलूस में खाने-पीने की चीज़ों को लुटा कर जहाँ रिज़्क़ (अन्न) की बेअदबी की गई, वहीं जुलूस के रास्तों में दोनों तरफ़ बड़ी संख्या में बे-पर्दा ख़वातीन (महिलाओं) का खाने-पीने की चीज़ें लूट कर नबी की तालीमात (शिक्षाओं) की धज्जियाँ उड़ाती नज़र आई।

शहर के अलावा मुल्क के दूसरे शहरों से भी जलूस की सोशल मीडिया पर ऐसी वीडियो और तस्वीरें सामने आई हैं, जो इस्लामी तालीमात के ख़िलाफ़ और नबी करीम से मोहब्बत की बजाय तौहीन (अपमान) का मंज़र पेश करती हैं। कुछ जुलूसों में तो महिलाएँ भी डांस करती देखी गईं और उसकी लीडरशिप भी कुछ नाम-निहाद (तथाकथित) सुन्नी उलेमा ही करते नज़र आए, मगर उन्होंने इन ग़ैर-शरई (इस्लाम के ख़िलाफ़) और ग़ैर-इख़लाक़ी हरकतों, औरतों की बे-हयाई, रिज़्क़ की बेअदबी और जलूस की पवित्रता की पामाली को रोकने के लिए कोई उचित कदम नहीं उठाया।

मास्टर शाहिद बरकाती ने कहा कि यह इस्लाम मुसलमानों और नबी की तौहीन की एक गहरी साज़िश है, जिस पर मुसलमानों,  विशेषकर उलेमा को तुरंत ध्यान देने के साथ ही इस तरह की हरकतों को रोक थाम के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। ख़ानक़ाह-ए-बरकातिया मारहरा शरीफ के सज्जादानशीन सैयद अमान मियां बरकाती बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने जलूस में बेहुरमती के खिलाफ ना सिर्फ़ आवाज़ उठाई बल्कि राष्ट्रीय स्तर के उलेमा और बुद्धिजीवियों से इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की अपील की।

उन्होंने क़ाज़ियान-ए-शहरे और प्रशासनिक अधिकारियों से अपील की कि वे गाइडलाइंस जारी करने के साथ-साथ आम मुसलमानों को जलूस के शिष्टाचार और सम्मान का पाठ पढ़ाएँ। इसके साथ ही, ग़ैर-इख़लाक़ी और ग़ैर-शरई हरकतों से बचने की हिदायत देना भी उनके मार्गदर्शन और ज़िम्मेदारी में शामिल है। ताकि भविष्य में इस तरह की शर्मनाक हरकतों से जलूस की पवित्रता को ठेस ना पहुँचने दी जाए। उन्होंने कहा कि बज़्म-ए-क़ासिमी अगले साल उलेमा, गणमान्य लोगों और समाज के ज़िम्मेदार लोगों के सहयोग से विशेष टीमें बनाकर लोगों को जलूस के शिष्टाचार और सम्मान के सही तरीके सिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

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