समता,न्याय, अधिकार के साथ प्रतिरोध धुरी बने अम्बेडकर : मनोज पासवान

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अम्बेडकर इस हजारों साल पुरानी प्रतिरोध की धारा के सबसे आधुनिक, सबसे तार्किक और सबसे सफल न्याय और समता की आधारभूत संरचना वाले नायक हैं


मनोज पासवान, शोधार्थी

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद एक विद्यालय में संविधान निर्माता बाबा साहब डा.अम्बेडकर की तस्वीर लेकर स्कूल में पढ़ रहे छात्र बेहद जोश में जय भीम का नारा लगाकर स्कूल के मूलभूत जरूरतों को लेकर प्रदर्शन करते हैं यह घटना ठीक उस समय के बाद की है कि जब दिल्ली में चले छात्रों नौजवान के लम्बे प्रदर्शन के बाद देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा है इस आंदोलन देश की राजनैतिक सामाजिक दशा को झकझोर दिया है अभूतपूर्व तरीके से इस आंदोलन को देश में बन रहे या निर्मित हो चुके सामाजिक, सांस्कृतिक व विचारधारा की राह को समझने की गहरे चिंतन की ओर अग्रसर करता है।

प्रतिरोध की धारा और समता और न्याय की यात्रा

भारतीय इतिहास को अक्सर राजाओं के युद्धों के इतिहास के रूप में पढ़ाया जाता है। लेकिन इस इतिहास के समानांतर एक दूसरा इतिहास भी चलता रहा है, जिसे हम प्रतिरोध की धारा कहते हैं। यह धारा सत्ता से सवाल पूछने वालों की धारा है। एक तरफ मनु हैं, तो दूसरी तरफ बुद्ध। एक तरफ तुलसी का ‘पूजहि विप्र सकल गुन हीना’ है, तो दूसरी तरफ कबीर का ‘जाति न पूछो साधु की’। एक तरफ वर्ण व्यवस्था को ईश्वरीय बताने वाले ग्रंथ हैं, तो दूसरी तरफ रैदास, फुले, पेरियार और अम्बेडकर। अम्बेडकर इस हजारों साल पुरानी प्रतिरोध की धारा के सबसे आधुनिक, सबसे तार्किक और सबसे सफल न्याय और समता की आधारभूत संरचना वाले नायक हैं।

प्रतिरोध को धर्म से निकालकर अधिकार तक लाना

अम्बेडकर से पहले तक दलित प्रतिरोध ज्यादातर सामाजिक और धार्मिक दया की मांग तक सीमित था। अम्बेडकर ने पहली बार इसे अधिकार और स्वाभिमान की भाषा दी। उनका प्रतिरोध केवल यह नहीं था कि हमें मंदिर में जाने दो। उनका प्रतिरोध यह था कि वह मंदिर और वह ईश्वर ही क्यों, जो हमें मनुष्य मानने से इंकार करता है? इसीलिए उनके आंदोलनों का चरित्र प्रतीकात्मक नहीं, वैचारिक था। महाड़ का चवदार तालाब सत्याग्रह सिर्फ पानी पीने का आंदोलन नहीं था। वह इस घोषणा का आंदोलन था कि सार्वजनिक संसाधनों पर पहला हक इस देश के नागरिक का है, जाति का नहीं। मनुस्मृति दहन किसी किताब से नफरत नहीं थी। वह उस विचारधारा को जलाने का ऐलान था, जो करोड़ों लोगों को जन्म से अछूत बनाती है।

अम्बेडकर के प्रतिरोध का स्वरूप

अम्बेडकर का प्रतिरोध भावुक नहीं, सुनियोजित था। उसके तीन स्पष्ट हथियार थे। पहला, शिक्षा। उन्होंने कहा था, ‘शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो पियेगा वही दहाड़ेगा।’ ब्राह्मणवाद ने ज्ञान पर एकाधिकार किया था, अम्बेडकर ने उसे तोड़ा। वह खुद कोलंबिया और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़कर आए और फिर कहा कि जाओ, अपने घरों की दीवारों पर लिख दो कि हमें पढ़ना है और शासक बनना है।

दूसरा, संगठन। वह जानते थे कि बिखरा हुआ समाज कभी प्रतिरोध नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने बहिष्कृत हितकारिणी सभा, स्वतंत्र मजदूर पार्टी और बाद में शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन बनाया। उनका स्पष्ट मानना था कि तुम्हारी लड़ाई कोई दूसरा नहीं लड़ेगा।

तीसरा, धर्मांतरण। यह उनके प्रतिरोध का चरम था। 1935 में येवला में उन्होंने कहा था, ‘मैं हिंदू धर्म में पैदा हुआ, यह मेरे वश में नहीं था, लेकिन मैं हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं।’ और 1956 में नागपुर में 5 लाख लोगों के साथ बौद्ध धम्म अपनाकर उन्होंने साबित किया कि मुक्ति धर्म बदलने से नहीं, बल्कि गुलामी के धर्म को छोड़ने से मिलती है। बौद्ध धर्म उनका नया हथियार था, जो समता, करुणा और प्रज्ञा पर आधारित था।

संविधान: प्रतिरोध और न्याय का दस्तावेज

अम्बेडकर के प्रतिरोध की सबसे बड़ी जीत भारत का संविधान है। उन्होंने प्रतिरोध को सड़क से उठाकर किताब में दर्ज कर दिया। जब उन्होंने संविधान में अनुच्छेद 17 लिखकर छुआछूत को अपराध घोषित किया, तो वह हजारों साल के सामाजिक प्रतिरोध को कानूनी जीत में बदल रहे थे। जब उन्होंने आरक्षण, वयस्क मताधिकार और समता का अधिकार लिखा, तो वह यह सुनिश्चित कर रहे थे कि अब सत्ता सिर्फ कुछ लोगों की बपौती नहीं रहेगी। संविधान इस देश में प्रतिरोध की धारा का सबसे पवित्र दस्तावेज है। यह कहता है कि इस देश का मालिक कोई राजा, कोई जाति या कोई धर्म नहीं, बल्कि भारत का प्रत्येक नागरिक है।

अम्बेडकर और आधुनिक राजनीति

आज जब उत्तर प्रदेश में PDA यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक की चर्चा हो रही है, तब अम्बेडकर का विचार और भी प्रासंगिक हो जाता है। PDA कोई चुनावी नारा नहीं, बल्कि अम्बेडकर के उसी सामाजिक बहुमत की अवधारणा का नया रूप है। अम्बेडकर ने दृष्टि प्रदान की वर्चस्ववादी , प्रभुत्ववादी अनैतिक व असमानतावादी व्यवस्था के खिलाफ हाशिए पर छूटे बहुसंख्यकों को एकजुट होना होगा। और यह एकजुटता सिर्फ वोट के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक न्याय के साथ राजनैतिक न्याय के लिए हो अम्बेडकर का प्रतिरोध हमसे कहता है – अपना विकल्प बनाओ। अपने स्कूल बनाओ, अपना व्यापार बनाओ, अपना इतिहास लिखो। क्योंकि जो कौम अपना विकल्प नहीं बनाती, वह हमेशा दूसरों की कृपा पर निर्भर रहती है।

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