संत गाडगे ने जातिवाद, मद्यपान के खिलाफ चलाया अभियान : राम बहादुर

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गाडगे जी कहते थे, ईश्वर मंदिरों या तीर्थों में नहीं, बल्कि दीन-दुखियों की सेवा में है

लखनऊ। डॉ. अम्बेडकर राष्टï्रीय एकता मंच के संयोजक एवं पूर्व आईएएस राम बहादुर ने संत गाडगे के निर्वाण दिवस पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि गाडगे महाराज एक घुमक्कड़ संत थे। वे फटे-चीथड़े कपड़े पहनकर, सिर पर टूटा हुआ गडग़ा (मिट्टी का बर्तन) रखकर और हाथ में झाड़ू लेकर गांव-गांव भटकते थे। किसी गांव में प्रवेश करने पर सबसे पहले वे गलियों, नालियों और सडक़ों की सफाई करते थे। सफाई पूरी होने के बाद ही वे कीर्तन करते और लोगों को संदेश देते।

उनका कीर्तन अनोखा था – संत तुकाराम, कबीर और अन्य भक्ति संतों के दोहे गाकर वे अंधविश्वास, जातिवाद, मद्यपान और अस्वच्छता के खिलाफ जनजागरण करते थे। उन्होंने कहा कि संत गाडगे कहते थे कि मानव सेवा ही माधव सेवा है। ईश्वर मंदिरों या तीर्थों में नहीं, बल्कि दीन-दुखियों की सेवा में है। उन्होंने सैकड़ों धर्मशालाएँ, छात्रावास, स्कूल, अस्पताल और पशु आश्रय बनवाए। दान में मिला धन वे कभी अपने लिए नहीं रखते थे, बल्कि समाज की भलाई में लगा देते थे।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर उन्हें ज्योतिबा फुले के बाद सबसे बड़ा जनसेवक मानते थे।गाडगे जी ने स्वच्छता को धर्म का हिस्सा बनाया। आज भारत में ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की प्रेरणा उनके विचारों से ही मिलती है। महाराष्ट्र सरकार ने उनके नाम पर ‘संत गाडगे बाबा ग्राम स्वच्छता अभियान’ चलाया और अमरावती विश्वविद्यालय का नाम उनके नाम पर रखा गया। इस पुण्यतिथि पर हम संकल्प लें कि उनके आदर्शों पर चलें – स्वच्छता अपनाएं, गरीबों की सेवा करें, अंधविश्वास त्यागें और मानवता का सम्मान करें। राष्ट्रसंत गाडगे महाराज को कोटि-कोटि नमन! आप अमर रहें, आपके विचार अमर रहें!

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