आस्था मनुष्य की निजी अनुभूति है, शोषण उस अनुभूति पर किसी दूसरे का कब्ज़ा

लखनऊ। संविधान संरक्षण मंच के राष्ट्रीय संयोजक गौतम राणे सागर ने कहा कि आस्था कहती है “मैं ईश्वर पर विश्वास करता हूँ।”शोषण कहता है, “मेरे माध्यम से ईश्वर तक पहुँचों, और उसकी कीमत चुकाओ।”यहीं से फर्क शुरू होता है। यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है, सर्वज्ञ है और आपके मन की बात बिना कहे जानता है, तो फिर उसके सामने आपकी श्रद्धा की कीमत नोटों, सोने, चाँदी या महंगे अनुष्ठानों में क्यों तय हो?
उन्होंने कहा कि क्या सर्वशक्तिमान ईश्वर को रिश्वत चाहिए? क्या आपकी मनोकामना पूरी करने के लिए कोई भुगतान-तालिका है? क्या भगवान के दरबार में भी कोई “वीआईपी पास” है? और यदि कोई मनुष्य आपके सामने बैठकर यह दावा करता है कि इतना धन दो, इतनी पूजा कराओ, इतना चढ़ावा चढ़ाओ—तभी भगवान प्रसन्न होंगे, तो एक क्षण के लिए रुकिए और पूछिए—भगवान ने यह आदेश कब दिया? और उस आदेश की रसीद किसके पास है?
भक्ति में प्रेम हो सकता है, सौदा नहीं। आप फूल चढ़ाइए—आपकी श्रद्धा। दीप जलाइए—आपकी आस्था। प्रार्थना कीजिए—आपका अधिकार। दान कीजिए—आपकी इच्छा। लेकिन यदि कोई आपके भय को पकड़कर कहे—“पैसा नहीं दिया तो अनिष्ट होगा।” तो यह भक्ति नहीं, भय का व्यापार है।
यदि कहा जाए—“इतना सोना चढ़ाओ, तभी मनोकामना पूरी होगी।”तो सवाल उठना चाहिए— यह भगवान की आवश्यकता है या किसी इंसान की? अपनी मेहनत की कमाई को भगवान के नाम पर अंधे विश्वास की भेंट मत बनाइए। एक गरीब माँ अपनी बेटी की फीस भरने के लिए परेशान है और उसी समाज में कोई उसे समझाता है कि उसकी समस्या दूर करने के लिए महंगी पूजा जरूरी है।
एक बीमार व्यक्ति इलाज के लिए पैसे जोड़ रहा है और उसे भय दिखाया जाता है कि बीमारी किसी “दोष” के कारण है और उसका समाधान महंगे अनुष्ठान में है। एक बेरोजगार युवा नौकरी की तलाश में है और उसे बताया जाता है कि उसकी समस्या किसी पूजा के बिना दूर नहीं होगी।
यहाँ सवाल भगवान से कम और उस व्यक्ति से अधिक है जो भगवान के नाम पर यह दावा कर रहा है। क्योंकि बीमारी का इलाज चिकित्सा से होगा। बेरोजगारी का समाधान अवसर और कौशल से होगा।
गरीबी का समाधान आर्थिक व्यवस्था और मेहनत से होगा। अज्ञान का इलाज शिक्षा से होगा। और किसी मनुष्य की मजबूरी को धार्मिक भय में बदलकर पैसा कमाना—उस पर सवाल होना ही चाहिए। भगवान को बचाने की जरूरत नहीं—भक्त को विवेक की जरूरत है।