ज़िंदगी के सफर में, अपने भीतर के बचपन को संभालकर रखिए  :  राजीव कुमार

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कभी-कभी बैठकर खुद से पूछिए—आखिर हम किस दौड़ में भाग रहे हैं?

लखनऊ। डीपीआरए के प्रांतीय प्रवक्ता व जिलाध्यक्ष लखनऊ एवं चीफ फार्मासिस्ट  बलरामपुर अस्पताल राजीव कुमार का कहना है कि उम्र के साथ हम दुनियादारी सीख जाते हैं, ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाना सीख जाते हैं और भविष्य की चिंताओं में जीना सीख जाते हैं।

लेकिन इन सब के बीच अक्सर हम अपने भीतर के उस मासूम बच्चे को खो देते हैं, जो छोटी-छोटी बातों में खुश होना जानता था। कभी-कभी बैठकर खुद से पूछिए—आखिर हम किस दौड़ में भाग रहे हैं?

​”दौड़ते-भागते शहर के सन्नाटों में,

ढूंढता है दिल वो सुकून पुराने मकानों में।

उम्र तो बढ़ती रही दुनिया के उसूलों पर,

एक बच्चा कहीं छूट गया ख्वाहिशों के ज़माने में।”

​राजीव कुमार ने कहा कि बचपन में हमारी खुशियाँ किसी महंगे सामान की मोहताज नहीं थीं। बारिश की बूंदों को हाथों में समेटना, पेड़ की छांव में बेफिक्र बैठ जाना,  दोस्तों की बेपरवाह हंसी और मिट्टी की सौंधी खुशबू—यही हमारी सबसे बड़ी दौलत थी। तब हमारे पास सवाल कम थे और हर चीज़ को देखकर हैरान होने का जादू था।

​आज हम पेड़ की सुंदरता देखने के बजाय उसकी लकड़ी का मोल लगाते हैं। बारिश को महसूस करने के बजाय अपनी योजनाओं के बिगड़ने की चिंता करते हैं।

हम ज़िन्दगी को समझने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि उसे जी भरकर महसूस करना ही भूल गए हैं।

​”ना शिकवा कोई, ना कोई मलाल था,

बचपन का वो दौर भी कितना कमाल था।

ना सोच थी कल की, ना फिक्र थी आज की,

कागज़ की कश्ती में भी अपना ही एक जहान था।”

​उन्होंने कहा कि प्रकृति हमें हमेशा यही सिखाती है कि किसी भी चीज़ में जल्दबाजी नहीं है। पेड़ आराम से बढ़ता है, नदियाँ अपनी सहज लय में बहती हैं। फिर हम इंसान ही हर वक्त क्यों भागे जा रहे हैं?

​ज़िम्मेदारी निभाना ज़रूरी है, लेकिन इतना भी नहीं कि आसमान को निहारने की मोहलत न मिले। समझदार बनना अच्छी बात है, लेकिन इतनी समझदारी भी किस काम की, जो जीवन के छोटे-छोटे खूबसूरत पलों का आनंद ही छीन ले।

​ज़िंदगी किसी बड़ी घटना या बड़ी उपलब्धि का नाम नहीं है। यह तो रोज़ घटने वाले छोटे-छोटे लम्हों का हसीन कारवां है। किसी अपने की मुस्कान, सुबह की हल्की धूप, किसी पुराने दोस्त का फोन या शांत शाम का सुकून—इन्हें मामूली मत समझिए।

​”थोड़ा सा बचपन बचाकर रख ऐ इंसान,

ये समझदारी अक्सर उदास कर देती है।”

​अपने भीतर के उस बच्चे को कभी मत मरने दीजिए। खुश रहने के लिए किसी बड़ी वजह या सही वक्त का इंतज़ार मत कीजिए, बस आज और इसी पल में जीना सीखिए।

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