फैसला हो न सका आज भी कलम से मेरी, हाल-ए-दिल अपना लिखूँ या तेरी मेहरबानी लिखूँ

राजीव कुमार (चीफ फार्मासिस्ट बलरामपुर अस्पताल )
दिल के कागज़ पे कोई आज कहानी लिखूँ,
या कि आँखों में रुकी दर्द की पानी लिखूँ।
टूट कर बिखरे हैं जो ख्वाब उन्हें समेटूँ मैं,
या फिर अपनी ही किसी भूली रवानी लिखूँ।
छूट जाते हैं जो अपने ही राह में अक्सर,
उन बदलते हुए रिश्तों की निशानी लिखूँ।
रात भर चलती रही खुद से जो मेरी बातें,
उन सुलगती हुई रातों की ज़बानी लिखूँ।
लब पे जो हँसी है, वो तो महज़ एक पर्दा है,
इस तबस्सुम के परे छुपी जो बरसाती नीर, वही पुरानी लिखूँ।
फैसला हो न सका आज भी कलम से मेरी,
हाल-ए-दिल अपना लिखूँ या तेरी मेहरबानी लिखूँ।