वंदे मातरम् : माँ के तीन रूप और राष्ट्र का नैतिक पुनर्जागरण

लखनऊ। संविधान संरक्षण मंच के राष्ट्रीय संयोजक गौतम राणे सागर ने वन्दे मातरम् पर चर्चा के दौरान कहा कि आनंदमठ को केवल “वंदे मातरम्” के कारण पढ़ना उसके साथ न्याय नहीं होगा।
बंकिमचंद्र ने इस उपन्यास में एक ऐसी मातृभूमि की कल्पना की है जो केवल प्रशंसा की पात्र नहीं है—वह ऐसी माता है जिसकी दशा देखकर उसकी संतान के भीतर लज्जा, करुणा, कर्तव्य और संघर्ष एक साथ जागते हैं।
यही वह बिंदु है जहाँ “वंदे मातरम्” एक गीत से आगे बढ़कर एक नैतिक दर्शन बन जाता है। बंकिम की दृष्टि में माता के तीन रूपों की कल्पना विशेष अर्थ रखती है।
पहला—वह माता जो कभी समृद्ध, सुंदर और गौरवशाली थी।
दूसरा—वह माता जो वर्तमान में दरिद्र, पीड़ित और दुर्बल हो चुकी है।
तीसरा—वह माता जो पुनः शक्ति और वैभव प्राप्त कर सकती है।
गौतम राणे सागर ने कहा कि यह केवल देवी के तीन रूप नहीं हैं। यह वास्तव में राष्ट्र के अतीत, वर्तमान और भविष्य का रूपक है।
और इसी रूपक के भीतर आज के भारत को देखने पर “वंदे मातरम्” का एक अत्यंत गंभीर अर्थ सामने आता है।
पहली माता : स्मृति की माता
हर राष्ट्र अपने अतीत से शक्ति ग्रहण करता है। बंकिम के लिए भारत कोई निर्जीव भूगोल नहीं था। उसकी स्मृति में साहित्य था, दर्शन था, ज्ञान था, कृषि थी, संस्कृति थी, प्रकृति थी और मनुष्य के जीवन से जुड़ी एक व्यापक सभ्यता थी।
इसलिए मातृभूमि का पहला रूप गौरव की स्मृति है। लेकिन स्मृति का अर्थ केवल अतीत पर गर्व करना नहीं है। यदि हम कहते हैं कि हमारे पूर्वज महान थे, तो अगला प्रश्न स्वतः खड़ा होता है—क्या हम उनके योग्य हैं? यदि हमारी सभ्यता ने ज्ञान को सम्मान दिया था, तो क्या आज हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है?
यदि हमारे समाज ने श्रम और उत्पादन को जीवन का आधार माना था, तो क्या आज मेहनत करने वाले व्यक्ति को उसके श्रम का उचित सम्मान और प्रतिफल मिल रहा है? यदि हमने धर्म को कर्तव्य और लोकमंगल से जोड़ा था, तो क्या आज सार्वजनिक जीवन में कर्तव्य की भावना उतनी ही मजबूत है? अतीत का गौरव तभी सार्थक है जब वह वर्तमान को बेहतर बनाने की प्रेरणा बने। अतीत की माता की पूजा वर्तमान की माता की उपेक्षा करके नहीं की जा सकती।
दूसरी माता : पीड़ा की माता
यहीं आनंदमठ का सबसे मार्मिक पक्ष सामने आता है। माता का दूसरा रूप वैभवशाली नहीं है। वह पीड़ित है। वह अकाल से त्रस्त है। उसकी संतानों में भूख है। उसकी धरती पर असुरक्षा और अव्यवस्था है। और उसकी संतानों के सामने प्रश्न है—क्या हम केवल इस पीड़ा को देखते रहेंगे? यही प्रश्न आज भी किसी भी संवेदनशील नागरिक के सामने खड़ा हो सकता है। जब किसी बच्चे को अच्छी शिक्षा नहीं मिलती, तब केवल वह बच्चा नहीं हारता—माता का भविष्य कमजोर होता है।
जब कोई युवा वर्षों तक रोजगार की तलाश में भटकता है, तब केवल एक परिवार की चिंता नहीं बढ़ती—माता की उत्पादन-शक्ति निष्क्रिय होती है। जब महँगाई किसी गरीब परिवार की आय को निगल जाती है, तब केवल उसकी रसोई प्रभावित नहीं होती—माता की समृद्धि का दावा प्रश्नों के घेरे में आता है।
जब निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार के कारण सार्वजनिक संपत्ति कमजोर होती है, तब केवल सरकारी धन नहीं जाता—माता के शरीर पर चोट लगती है। और जब कोई पुल, सड़क या सार्वजनिक भवन अपनी अपेक्षित उपयोगिता और मजबूती के अनुरूप नहीं टिकता, तो प्रश्न केवल इंजीनियरिंग का नहीं रहता।
वह नैतिकता का प्रश्न बन जाता है। क्योंकि जिस धन से वह निर्माण हुआ है, वह किसी मंत्री की निजी संपत्ति नहीं थी। वह जनता का धन था। अर्थात्— माता की संतान ने अपनी मेहनत से जो दिया, उसी से माता का निर्माण होना था। उस निर्माण में चोरी या गुणवत्ता से समझौता करना केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि नैतिक विश्वासघात है।
तीसरी माता : पुनर्जागरण की माता
लेकिन बंकिम की कल्पना निराशा पर समाप्त नहीं होती। यही आनंदमठ का सबसे आशावादी पक्ष है। पीड़ित माता अंतिम सत्य नहीं है। उसके भीतर पुनर्जन्म की संभावना है। वह फिर शक्तिशाली हो सकती है। वह फिर ज्ञान, समृद्धि और आत्मसम्मान की भूमि बन सकती है। लेकिन उसके लिए केवल जयघोष पर्याप्त नहीं।
पुनर्जागरण के लिए चरित्र चाहिए। यही बात आज विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हम जितनी तेजी से विशाल निर्माण कर रहे हैं, उतनी ही तेजी से हमें नैतिक संस्थाओं का निर्माण भी करना होगा। एक मजबूत पुल के साथ मजबूत ईमानदारी चाहिए। एक आधुनिक हवाई अड्डे के साथ आधुनिक प्रशासन चाहिए। एक चमकदार रेलवे स्टेशन के साथ उत्कृष्ट सार्वजनिक सेवा चाहिए। एक विशाल विश्वविद्यालय भवन के साथ उत्कृष्ट शिक्षक चाहिए। एक डिजिटल व्यवस्था के साथ पारदर्शिता चाहिए। क्योंकि राष्ट्र केवल ईंट, सीमेंट, स्टील और तकनीक से महान नहीं बनता। राष्ट्र मनुष्य के चरित्र से महान बनता है।