समाज की मुख्यधारा केवल सत्ता और प्रभावशाली संस्थानों द्वारा निर्धारित नहीं होती : डॉ. चंद्रिया गोपानी

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‘मुख्यधारा के महानायक’ मेमोरियल लेक्चर में सामाजिक न्याय और वैकल्पिक इतिहास पर हुआ गंभीर विमर्श

लखनऊ। कैफी आज़मी एकेडमी, पेपर मिल कॉलोनी, निशातगंज, लखनऊ में करंट एजेंडा मैगज़ीन की ओर से ‘मुख्यधारा के महानायक’ विषय पर मेमोरियल लेक्चर का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. चंद्रिया गोपानी ने की। कार्यक्रम में भगवानस्वरूप कटियार, सुभाषचंद्र कुशवाहा और प्रो. कालीचरण स्नेही ने वक्ता के रूप में अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन करेंट एजेंडा पत्रिका के सह-संपादक और द इंटेलेक्चुअल वेबसाइट के संपादक डा. अनूप पटेल ने किया।

कार्यक्रम में रामस्वरूप वर्मा, जगदेव बाबू और पेरियार ललई यादव के विचारों, संघर्षों और सामाजिक योगदान को केंद्र में रखते हुए यह सवाल उठाया गया कि भारतीय इतिहास, साहित्य, अकादमिक जगत और सामाजिक विमर्श में ‘मुख्यधारा’ की परिभाषा आखिर किसने तय की है और इसके निर्माण की प्रक्रिया क्या रही है।

अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. चंद्रिया गोपानी ने कहा कि किसी समाज की मुख्यधारा केवल सत्ता और प्रभावशाली संस्थानों द्वारा निर्धारित नहीं होती, बल्कि उसे समाज के संघर्ष, विचार और परिवर्तन की प्रक्रियाएँ भी निर्मित करती हैं। उन्होंने कहा कि इतिहास को केवल प्रसिद्ध नामों के माध्यम से देखने के बजाय उन आवाज़ों को भी समझना जरूरी है, जिन्होंने सामाजिक बराबरी और न्याय के लिए संघर्ष किया. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मुख्यधारा की अवधारणा पर पुनर्विचार करना इतिहास और समाज को नए दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है।

वक्ता भगवानस्वरूप कटियार ने सामाजिक परिवर्तन के आंदोलनों और उनके विचारकों की भूमिका पर चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय समाज में बराबरी और सम्मान का प्रश्न लंबे समय से संघर्ष का विषय रहा है। उन्होंने अर्जक संघ के संस्थापक महामना रामस्वरूप वर्मा के वैचारिक-सांस्कृतिक दर्शन को उल्लेखित करते हुये कहा कि जिन व्यक्तित्वों ने स्थापित सामाजिक संरचनाओं पर सवाल उठाए, उनके योगदान को व्यापक सामाजिक संदर्भ में समझे जाने की जरूरत है। रामस्वरूप वर्मा ने एक वैकल्पिक व्यवस्था की नीव रखी जो आज राष्ट्रव्यापी हो रही है. उन्होंने कहा कि मुख्यधारा में शामिल होने का अर्थ केवल राजनीतिक या सांस्कृतिक रूप से प्रसिद्ध होना नहीं, बल्कि समाज के व्यापक हिस्से के जीवन और आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति देना भी है।

प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक सुभाषचंद्र कुशवाहा ने इतिहास लेखन और जनआंदोलनों के संदर्भ में कहा कि इतिहास केवल घटनाओं का विवरण नहीं है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि किसकी स्मृति को संरक्षित किया गया और किसकी स्मृति को हाशिये पर छोड़ दिया गया। उन्होंने बिहार लेनिन जगदेव बाबू के संघर्षो और राजनैतिक दर्शन को याद करते हुये कहा कि जगदेव बाबू के योगदान को सामाजिक न्याय और वैचारिक संघर्ष की परंपरा में देखने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि जनसंघर्षों के इतिहास को व्यापक संदर्भ में पढ़ने से भारतीय समाज में परिवर्तन की वास्तविक प्रक्रियाओं को समझने में मदद मिलती है।

प्रो. कालीचरण स्नेही ने कहा कि साहित्य, शिक्षा, इतिहास और संस्कृति के क्षेत्र में ‘मुख्यधारा’ की अपनी एक सत्ता होती है। उन्होंने उत्तर भारत के पेरियार ललई यादव के कृतित्व और व्यक्तित्व पर उल्लेखित करते हुये कहा कि सत्ता तय करती है कि किन विचारों और व्यक्तित्वों को प्रतिष्ठा मिलेगी और किन्हें लंबे समय तक हाशिये पर रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि मुख्यधारा को एक बंद और स्थिर अवधारणा के रूप में देखने के बजाय उसे लोकतांत्रिक और समावेशी बनाया जाए। इसके लिए वंचित और उपेक्षित सामाजिक समूहों के विचारों, संघर्षों और नायकों को विमर्श के केंद्र में लाना जरूरी है।

कार्यक्रम का संचालन करते हुये डा. अनूप पटेल ने कहा कि रामस्वरूप वर्मा के तर्कशील, सामाजिक न्याय और आर्थिक चिंतन, जगदेव बाबू के सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष तथा पेरियार ललई यादव के सामाजिक बराबरी, जाति-विरोधी चेतना और वैचारिक संघर्ष को ‘मुख्यधारा’ की वैचारिकी मे शामिल होना ही चाहिये। यही मुख्यधारा है।

कार्यक्रम के आयोजन प्रभारी मनोज पासवान ने बताया कि इन व्यक्तित्वों का मूल्यांकन केवल उनके समय की राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और लोकतांत्रिक चेतना के व्यापक परिप्रेक्ष्य में किया जाना चाहिए। किसी भी समाज की लोकतांत्रिक चेतना तभी मजबूत हो सकती है, जब उसके इतिहास में विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी, संघर्ष और योगदान को समान महत्व मिले। केवल अतीत के महानायकों को याद करना नहीं, बल्कि वर्तमान में ‘मुख्यधारा’ की परिभाषा और उसके सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव पर गंभीर संवाद शुरू करना था। आयोजन में सामाजिक न्याय, इतिहास, साहित्य और अकादमिक जगत से जुड़े लोगों ने सहभागिता की।

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