आन्दोलन और संघर्ष से ही वजूद में आई बसपा : अशोक कुमार

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कांशीराम जी के नेतृत्व में खुद मायावती जी ने भी किये बड़े आन्दोलन, आखिर अब क्यों कर रहीं किनारा

कमल जयंत

लखनऊ। विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े समाजसेवी अशोक कुमार का कहना है कि मेरठ की दलित छात्रा का अपहरण व हत्या के विरोध में हाल के धरना-प्रदर्शन पर बसपा सुप्रीमो मायावती जी द्वारा दिए गये बयान से बहुजन समाज में असमंजस की स्थित बन गई है। बयान के पक्ष व विपक्ष में प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं। किसी भी राजनीतिक दल के उत्थान के लिए सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक मुद्दों पर धरना-प्रदर्शन व आंदोलन अति महत्वपूर्ण उपकरण होते हैं, जिसके द्वारा वह अपना समर्थन आधार ( support base) बढ़ाता है।

स्वयं बहुजन समाज पार्टी भी इन्हीं आंदोलन,  धरना-प्रदर्शन से ही सत्ता में आई जिसका आधार बामसेफ की मजबूत गैर- राजनैतिक जड़ें व DS4 द्वारा तैयार किया गया एजिटेशनल विंग ( जाग्रति जत्था, महिला मोर्चा व छात्र मोर्चा) था। जिसे कालांतर में समाप्त कर दिया गया और यहीं से बहुजन उत्थान व सामाजिक- आर्थिक परिवर्तन का आंदोलन ठप्प होने से उसकी राजनीति का क्षरण होने लगा।

   मान्यवर कांशीराम की विचारधारा व आंदोलन मुख्यतः डा अम्बेडकर के तीन बातों के आधार पर थी

1- शिक्षित हो ( Educate), आंदोलित हो ( Agitate), संगठित हो( Organise) .

2- 18 मार्च 1956 को आगरा में दिया गया भाषण जिसमें उन्होंनें कहा था, ” मुझे पढ़े दलित समाज के लिखे लोगों ने धोखा दिया।”

3- संविधान प्रदत्त ‘ एक व्यक्ति,एक वोट ,एक मूल्य ‘आधारित वोट का अधिकार।

कांशीराम जी ने डाक्टर अम्बेडकर के विचारों को अपने सतत प्रयास,  कठिन परिश्रम ,लगन, समर्पण व मिशन के प्रति अटूट विश्वास के साथ परिणाममूलक परिणति मे उतारने का सार्थक कार्य किया। उनके द्वारा पूना में डीके खापरडे व बोरकर,  दीनाभाना,  मनोहर आटे के साथ 1971 में स्थापित एससी, एसटी अन्य    पिछड़ा बर्ग व अल्पसंख्यक एसोसिएशन के बाद 1978 में अखिल भारतीय स्तर पर बामसेफ ( All India Backward -sc,st & other Backward class and minority community employees Federation) की स्थापना की जिसका पहला मुख्यालय दिल्ली के करोलबाग के हरध्यान सिंह मार्ग पर दो छोटे कमरों वाले मकान में स्थानांतरित किया।

अशोक कुमार ने बताया कि बामसेफ के गठन के द्वारा डा. अम्बेडकर के प्रथम परमादेश ‘ शिक्षित हो’ अंतर्गत देश के स्तर पर दलित शोषित कर्मचारियों के मध्य जागरुकता कार्यक्रम व पे बेक टू सोसाइटी ( Pay back to society)  अभियान सफलतापूर्वक चलाया गया। इनमें मुख्यत: रक्षा, रेलवे, डाक व तार विभाग, खाद्य और बैंक कर्मचारी प्रमुख थे। विस्तार के साथ-साथ राज्य कर्मचारी भी बामसेफ से जुड़ने लगे। बामसेफ के माध्यम से प्रथम चरण में कैडर कैम्पों द्वारा आरक्षण प्राप्त दलित कर्मचारियों को उनके सामाजिक कर्तव्य पे बैक टू सोसायटी के आधार पर संगठित होकर कार्य हेतु मिशनरी कार्यकर्ता बनाए जाने लगे। इन्हीं कैडर कैम्प / “अम्बेडकर मेला, ऑन व्हील”, के माध्यम से शोषक बनाम शोषित ( 15 बनाम 85) के विचार तथा नरैटिव को मूर्त रूप दिया गया जो बसपा के आगामी  राजनैतिक आंदोलन में 15- 85  के आधार पर ” वोट हमारा, राज तुम्हारा , नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।” जैसे नारों का नरैटिव बना।

अशोक कुमार का कहना है कि डा. अम्बेडकर की तरह बामसेफ द्वारा The oppressed Indian ( अंग्रेजी) , बहुजन नायक ( मराठी) व बहुजन संगठक (हिंदी) बड़े पैमाने पर अख़बार प्रकाशित किये गये। बहुजन संगठक की उत्तर भारत में दलितों पिछड़ों में जागरुकता पैदा करने में अहम भूमिका रही। बामसेफ का प्रथम अधिवेशन 1979 में नागपुर,  दूसरा अधिवेशन दिल्ली में 1980 तथा  व कांशीराम के नेतृत्व वाली बामसेफ का तीसरा व अंतिम अधिवेशन चंडीगढ के परेड ग्राउंड में 1981 में आयोजित किया गया जिसमें पहली बार  “बामसेफ वालंटियर फोर्स ” का औपचारिक गठन किया गया।

उन्होंने बताया कि बाबासाहब के दूसरे परमादेश आंदोलित हो ( Agitate) के आधार पर 6 दिसंबर, 1981 को आम दलित शोषित समाज को संवैधानिक अधिकारों के प्रति तथा अन्याय/ अत्याचार के विरुद्ध जाग्रत तथा आंदोलन हेतु तैयार करने के लिए ” दलित शोषित समाज संघर्ष समिति “( DS4) की स्थापना की। इसके अंतर्गत  पूरे देश में बड़े पैमाने पर साइकिल यात्राओं के जरिए दलित शोषित समाज को संघर्ष के माध्यम राजनैतिक भागीदारी के लिए तैयार किया गया। भविष्य की राजनीति के लिए DS4 में छात्र मोर्चा,  महिला मोर्चा व जन जागरण के लिए जाग्रति जत्था बनाए गये।

इसी अवधि में 15-85  के 85 का रुपांतरण ” बहुजन समाज ( 85% sc,st , OBC & persecuted minorities communities) ” में हो चुका था। 15  मार्च 1984 को DS4 की अखिल भारतीय स्तर की ऐतिहासिक विशाल रैली दिल्ली के वोट क्लब पर आयोजित की जिसमें लाखों की संख्या में लोग साइकिल रैली व अन्य माध्यम से आये थे। DS4 के बैनर तले ‘Limited political action ‘  द्वारा हरियाणा व उत्तर प्रदेश में चुनाव में अपने उम्मीदवार लड़ाये थे। अब बहुजन समाज सत्ता की राजनीत के लिए तैयार हो चुका था।

अशोक कुमार ने बताया कि बामसेफ की मजबूत नींव और  दलित शोषित समाज संघर्ष समिति( DS4) के ‘ अखिल भारतीय बहुजन जाग्रति अभियान व ‘ सड़क पर अनवरत संघर्ष रूपी वैचारिक भवन में 14अपैल 1984 को नई दिल्ली में डाक्टर अम्बेडकर के ‘सामाजिक न्याय,  दलित, शोषित समाज का राजनैतिक सशक्तिकरण ‘के दर्शन तथा कांशीराम का ‘ बहुजनों को देश का हुक्मरान ‘ बनाने के लक्ष्य पर आधारित “बहुजन समाज पार्टी” का गठन हुआ। इस पूरी प्रक्रिया व आंदोलन को ‘ बहुजन मिशन ” के नाम से जाना व प्रचलित किया गया।

 इस बहुजन मिशन के अंतर्गत चलाए गए आंदोलन व सड़क पर संघर्ष का संक्षिप्त विवरण, जिसके बारे में शायद वर्तमान बहुजन समाज न जानता हो  निम्न है:-

1- Ds4 ने 1982-83 के मध्य जागरुकता व बहुजन एकता के चलते समाज के सदस्यों पर होने वाले अन्याय व अत्याचार रोकने एवं इसके विरुद्ध संघर्ष करने की रणनीति के तहत ऐसे क्षेत्रों को चिन्हित कर उन्हें तैयारी के हिसाब से ” अन्याय मुक्त क्षेत्र ” घोषित किया। इस अभियान के चलते इन क्षेत्रों में दलित अत्याचार में कमी आयी और लोगों में प्रतिकार की भावना जागी।

2- विशाल साईकिल रैली : DS4 बैनर तले 6 दिसंबर 1983 से देश के पांच स्थानों ( कन्याकुमारी, कारगिल,  कोहिमा, पुरी व पोरबंदर) से एक विशाल साइकिल रैली मार्च प्रारंभ की गई जो 15 मार्च 1984 को बोट क्लब नई दिल्ली पर लाखों की संख्या में डा. अम्बेडकर के अधूरे मिशन को पूरा करने के संकल्प साथ समाप्त हुई।

3- पूना पैक्ट धिक्कार दिवस :     24 सितम्बर 1932 को महात्मा गांधी व  डाक्टर अम्बेडकर के मध्य दलितों के लिए कम्यूनल अवार्ड के अंतर्गत पृथक निर्वाचन के प्रावधान को निरस्त कर केंद्रीय व प्रांतीय विधायिकाओं व स्थानीय निकाय तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था हेतु ‘पूना पैक्ट’  नाम से समझौता हुआ जिस पर डाक्टर अम्बेडकर व हिंदू महासभा/ कांग्रेस की ओर से मदनमोहन मालवीय ने हस्ताक्षर किए।

संयुक्त निर्वाचन प्रणाली में दलितों के सही व वास्तविक प्रतिनिधि न चुनकर अन्य जातियों के हितों के लिए काम करने वाले गुलाम प्रतिनिधि चुन कर आने लगे। 24 सितम्बर 1982 को इस समझौते के 50 वर्ष पूर्ण होने पर मान्यवर कांशीराम के नेतृत्व में ” पूना पैक्ट धिक्कार दिवस ” मनाया गया जिसके द्वारा इस समझौते की हानियां बतायी गई । इसी दिन उनके द्वारा लिखित पुस्तक ‘ चमचा युग’  ( The Era of Stooges) का प्रकाशन और विमोचन किया गया।

4- आरक्षण समर्थक धरना एवं आरक्षण समर्थक क्षेत्रीय सम्मेलन : संविधान के अनुच्छेद 340 के अन्तर्गत पिछड़े वर्ग के आरक्षण हेतु गठित मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करवाने को लेकर जुलाई 1984 से लाल किले पर अनिश्चितकालीन धरना  कांशीराम के नेतृत्व में बसपा द्वारा किया गया। 1 अगस्त 1984 से 14 अगस्त 1984 तक जेल भरो आंदोलन चलाया गया, जिसमें आयोग द्वारा चिन्हित 3743 पिछड़ी जाति की संख्या के हिसाब से देश के कोने कोने से आये कार्यकर्ता प्रतिदिन 3743 की संख्या में स्वैच्छिक गिरफ्तार होकर जेल जाते थे।

इसके बाद पार्टी द्वारा कई जिलों में आरक्षण के समर्थन में क्षेत्रीय आरक्षण समर्थक सम्मेलन आयोजित किये गए जिसमें नारा ” मंडल आयोग लागू करो, वर्ना कुर्सी खाली करो” , जिसकी जितनी संख्या भारी ,उसकी उतनी भागीदारी” बसपा के इस आंदोलन ने पिछड़ी जातियों में चेतना जगाई  और बड़ी संख्या बसपा की नीतियों से जुड़ने लगे।

5-  दलित लेखराज हत्याकांड के विरुद्ध DS4 का संघर्ष: 1985 में बरेली जनपद के दलित मजदूर लेखराज के बेगारी न करने पर गांव के ठाकुर द्वारा हत्या कर उसका शव जलाने के विरुद्ध व न्याय के लिए बरेली में DS4 ने भंते तेजांकर दीप के नेतृत्व में कचेहरी में लगभग 10 हजार लोगों के साथ प्रदर्शन कर आरोपित कुंवर सर्वराज सिंह के विरुद्ध कार्रवाई व मृतक लेखराज के पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता की मांग की गई।

इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में ‘बरेली महिला मोर्चा’ की महिलाएं शामिल थी। मांगे न माने जाने तक प्रदर्शनकारियों ने डीएम आवास में अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन करने का एलान किया गया। जिसमें लगभग 24 घंटे के अंदर जिलाधिकारी ने सभी मांगों को मानकर कार्रवाई करने की घोषणा की। दुख की बात यह रही कि इस दलित हत्या के आरोपी कुंवर सर्वराज सिंह को 2009 में बसपा नेतृत्व ने आंवला लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाया, किंतु वह हार गया।

6- शराब भट्टी आंदोलन: 1986  में उप्र के बरेली शहर के जाटव बाहुल्य बस्ती  कटरा चांद खां स्थित देशी शराब की दुकान को बंद कराने हेतु ‘ DS4 बरेली महिला मोर्चा’ की अगुवाई में दुकान के सामने अनिश्चितकालीन धरना दिया गया। जिसके  फलस्वरूप प्रशासन द्वारा शराब की दुकान बंद करा दी गई। 39 दिन दुकान बंद रहने के बाद इसे पुन: खुलने पर स्थानीय महिलाओ ने फिर धरना-प्रदर्शन आरम्भ कर दिया जिस पर पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

इसी मध्य बसपा अध्यक्ष मान्यवर कांशीराम ने बरेली में अस्थाई डेरा डाल कर ‘कटरा चांद खां शराब भठ्ठी आंदोलन’ जारी रखने को बड़े पैमाने विस्तार कर “जेल भरों ” का आवाह्न किया। उनके इस आवाह्न पर उप्र के कई जिलों से बसपा मिशन से जुड़े महिला- पुरुष कार्यकर्ता बड़ी संख्या में प्रतिदिन जत्थों में बरेली जेल भरने लगे। जेल जाने वालों में प्रमुख रूप से आगरा, अलीगढ, कानपुर, मथुरा, सहारनपुर, लखनऊ, इलाहाबाद  व अन्य जिलों से थे। इस आंदोलन का प्रमुख नारा था, ” गांधी के चेलों,  शराब भट्ठी बंद करों, बंद करों” । महीनों तक चलने के बाद इसे स्थगित कर दिया गया।

बरेली महिला मोर्चा की प्रमुख व चर्चित महिलाओं में चम्पा देवी, तारा देवी,  ब्रम्हां देवी प्रमुख थी। इस आंदोलन की निगरानी के लिए बहन मायावती भी शामिल रहीं। यह आंदोलन पार्टी के विस्तार एवं प्रचार के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। फलस्वरूप 1989 के विधानसभा चुनाव में बसपा के पहली बार 13 विधायक जीतकर आए। 1993 में सपा- बसपा सरकार बनने पर आंदोलन में दर्ज मुकदमें वापस कराए गए।

दुर्भाग्यवश आंदोलन के उद्देश्य को भुला दिया गया और बसपा सरकार द्वारा भी दलित बस्तियों में शराब की दुकानें खुलती रहीं। जब कांशीराम जी से इस संबंध में पूछा गया तो उन्होंन चुप्पी साध ली। इस चर्चित आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार मिला। पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘टेलीग्राफ’ ने इसे प्रमुख स्थान दिया।

7- शिवरीनारायन मेला बलात्कार कांड: मध्य प्रदेश ( अब छत्तीसगढ) के आदिवासी बाहुल्य जिला जांजगीर-चम्पा( मान्यवर कांशीराम ने अपना पहला चुनाव 1984 में जांजगीर लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लड़ा था। जिसमें उन्हें 32000 के लगभग वोट प्राप्त हुए) स्थित शिवरीनारायन मंदिर परिसर के पास लगने वाले में एक विवाहित महिला की जो मंदिर परिसर स्थित कपड़े की दुकान के अंदर खरीदारी करने गई थी,  दुकानदार लाला उर्फ कृष्ण कुमार ने दुकान का दरवाजा बंद कर मंदिर के पुजारी के बेटे के साथ बलात्कार किया और फिर दुकान बाहर से बंदकर दुकानदार भाग गया।

उनके सहेली व अन्य लोगों की मदद से बाहर निकलकर पुलिस थाने में 09.02.1993 ( घटना 08.02.1993)को रिपोर्ट दर्ज कराने गए किन्तु रिपोर्ट न लिखने पर बसपा के दाऊराम रत्नाकर ( अब प्रदेश प्रभारी) ने अपने साथियों के साथ थाने में रिपोर्ट लिखाई और न्याय मिलने तक बसपा द्वारा आंदोलन चलाया गया जिसके अंतिम चरण में कांशीराम व बहन जी द्वारा एक सभा में भाग लेकर अन्याय व अत्याचार रोकने हेतु सत्ता प्राप्त करने का आवाह्न किया।

आन्दोलन के फलस्वरूप अतिरिक्त सेशन जज द्वारा अभियुक्तों को सजा सुनाई गई। बाद में उच्च न्यायालय मध्य प्रदेश में दायर अपील में 2012 में अभियुक्त बरी हो गए। इस आंदोलन के बाद प्रदेश में बसपा का ग्राफ काफी बढ़ा। इस घटना पर आधारित मान्यवर कांशीराम के साथ दिल्ली कार्यालय के पुराने मिशनरी व बहुजन संगठक के छायाकार ( photographer) ने फीचर फिल्म ” इंसाफ की आंधी” बनायी।

8- दैनिक जागरण के विरुद्ध धरना-प्रदर्शन: 1995 में पूर्व विधायक दीनानाथ भास्कर के हवाले से कांशीराम- मायावती की 12 वर्ष की लड़की होने के भ्रामक समाचार छापने पर लखनऊ के हजरत गंज में दैनिक जागरण के विरुद्ध आक्रामक प्रदर्शन किया।

इस प्रकार हम देखते हैं कि बसपा के उत्थान में आंदोलन,  धरना-प्रदर्शन व जेल भरों अभियान का बड़ा योगदान रहा। वर्तमान में विपक्ष की भूमिका में आक्रमकता व आंदोलन के अभाव तथा सुरक्षित बयानों के चलते पार्टी को अपेक्षित सफलता संदिग्ध है।

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