2022 में अखिलेश ने भाजपा के कहने पर बदले थे 95 प्रत्याशी : स्वामी प्रसाद मौर्य

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सपा के सिंबल देकर टिकट बदलने के कारण यूपी में फिर से स्थापित हुई भाजपा

कमल जयंत

लखनऊ। अपनी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं यूपी के पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य का कहना है कि सपा-बसपा और भाजपा तीनों एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। मौर्य ने कहा कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव पीडीए यानि बहुजन समाज की बात करते हैं। जब सपा में गये तो पता चला कि भाजपा के इशारे या दबाव में सपा ने 2022 में यूपी में विधानसभा का चुनाव भाजपा से सांठगांठ करके लड़ा और सपा ने भाजपा के कहने पर 95 टिकट प्रत्याशियों को चुनाव निशान देने के बाद बदल दिये। जिसकी वजह से यूपी में भाजपा की सरकार बनी और सपा 110 सीटों पर सिमटकर रह गयी।

दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के विरोध में काम होने लगा तो मैंने उसका विरोध किया

मौर्य ने कहा कि उनकी पहचान दलितों, आदिवासियों, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों के हितों की प्राथमिकता रही है। बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर और कांशीराम समेत बहुजन समाज में जन्में संतों-महापुरुषों की विचारधारा पर शुरू से काम कर रहे हैं।

हम आज भी उन्हीं के दिखाये रास्ते पर काम कर रहे हैं, मुझे जब-जब, जहां-जहां अपने महापुरुषों की विचारधारा पर काम करने में अवरोध पैदा हुआ और दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के विरोध में काम होने लगा तो मैंने उसका विरोध किया और बहुजन समाज के विचारों के विपरीत काम करने वाले दल चाहे वह बसपा हो या सपा उसे छोड़ने के लिए हमें मजबूर होना पड़ा।

सपा और बसपा दोनों ही दल बहुजनों या पीडीए के अधिकारों की रक्षा करने के बजाय भाजपा के हितों की ज्यादा रक्षा करते नजर आ रहे

बसपा ने बाबा साहब और कांशीराम जी की विचारधारा से किनारा कर लिया, इसलिए मैंने बसपा से किनारा कर लिया। सबका साथ, सबका विकास करने वाली भाजपा में शामिल होने पर उनकी बहुजन विरोधी विचारधारा सामने आयी और देखा कि भाजपा दलितों, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों की सबसे बड़ी विरोधी है और इन वर्गों की एक नंबर की दुश्मन है।

भाजपा केवल वोट के लिए दलितों व पिछड़ा वर्ग के लोगों को हिन्दू मानती है। सत्ता में आने के बाद इन वर्गों के खिलाफ काम करती है।

यही वजह रही कि हमें भाजपा से नाता तोडऩा पड़ा। सपा प्रमुख पीडीए-पीडीए चिल्लाते हैं, लेकिन वह आजतक पीडीए का क्या मतलब होता है, इसे समझा नहीं सके। कुल मिलाकर सपा और बसपा दोनों ही दल बहुजनों या पीडीए के अधिकारों की रक्षा करने के बजाय भाजपा के हितों की ज्यादा रक्षा करते नजर आ रहे हैं।

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